Shri Guru Arjun Dev Ji ! पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी !

Shri Guru Arjun Dev Ji

Shri Guru Arjun Dev Ji

श्री गुरु ग्रंथ साहिब के संकलनकर्त्ता पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी

 Shri Guru Arjun Dev Ji – श्री गुरु ग्रंथ साहिब के संकलनकर्त्ता पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव की वाणी भारत की एक ऐसी अमूल्य धरोहर है जो हमारी संस्कृति, वैश्विक चेतना तथा जीव मात्र के प्रति प्रीति और सदाशयता की साक्षी है।

Shri Guru Arjun Dev ji ka janam kab hua ?

सच्चाई पर प्राण न्यौछावर करने वाले तथा संगीत को संत भाषा देने वाले श्री गुरु अर्जुन देव का स्थान दस सिख गुरुओं में अपने ढंग का एक अलग स्थान है।

पंचम पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी का गुरुगद्दी काल 1581-1606 तक रहा। आप श्री गुरु राम दास जी और बीबी भानी जी के छोटे पुत्र थे। श्री गुरु अर्जुन देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1563 में गोइंदवाल साहिब में हुआ था।

Shri Guru Arjun Dev ji ka vivah

गुरु जी बाल्यकाल से ही अत्यंत तेजस्वी थे। 4 वर्ष की आयु में आपने रागों पर आधारित गुरवाणी का गायन आरंभ कर दिया था। 11 वर्ष की आयु में आप अनेक भाषाओं और राग रागिनियों के मर्मी कलावंत बन चुके थे।

सन् 1579 में आपका विवाह जालंधर के माऊ गांव के कृष्णचंद की सुपुत्री माता गंगा जी के साथ हुआ। आपके गायन में एक आलौकिक कशिश थी। श्री गुरु अर्जुन देव जी के नाना तीसरे गुरु अमरदास जी गुरु जी की विद्वता के इतने कायल थे कि उन्हें ‘वाणी का बोहिथ’ यानी ‘वाणी का जहाज’ मानते थे।

श्री गुरु अर्जुन देव जी ने केवल 43 वर्ष की आयु पाई थी लेकिन आपके कार्यों को देखा जाए तो आश्चर्य होता है।

कुल 15 वर्षों में आपने इतने कार्य किए जिनके लिए कई पीढ़ियां लग जाएं तो भी काम पूरा न हो। श्री गुरु अर्जुन देव जी की वाणी कई भाषाओं में लहलहाई है। सुखमणि आपकी सर्वोत्कृष्ट रचना है जिस पर ब्रजभाषा का गहरा रंग है।

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गुरु जी की रचनाओं का एक बड़ा भाग पंजाबी के रंग में रंगा है

कुछ रचनाओं में संस्कृत और प्राकृत का गहरा पुट है तो अन्यों में फारसी और लैहंदी का प्रभाव देखने को मिलता है। गुरु जी की रचनाओं का एक बड़ा भाग पंजाबी के रंग में रंगा है लेकिन यह पंजाबी ऐसी हैं कि जो पंजाब क्षेत्र तक सीमित नहीं है।

इसमें अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों को उदारतापूर्वक शामिल किया गया है। वास्तव में उन्होंने पंजाबी को एक संत भाषा में ढाल देने का कार्य किया है।

Shri Guru Arjun Dev ji diya rachnava

श्री आदिग्रंथ की रचना

आपने श्री आदिग्रंथ की रचना की। आपने पहले के चार गुरुओं तथा समकालीन संतों की वाणी का प्रामाणिक पाठ पूछ-पूछ कर तैयार किया जिनमें लगभग 15 हजार से अधिक बंद और 3 हजार के लगभग शब्द शामिल हैं। इन रचनाओं को संग्रहित और संकलित कर आपने श्री आदिग्रंथ की रचना की। श्री आदिग्रंथ में पांच गुरु साहिबान की वाणी के साथ साथ 30 भगतों, भाटों व सिखों की वाणी संग्रहित की गई।

इसमें बाद में दशम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने नौवें गुरु तेग बहादुर जी की वाणी भी शामिल की। श्री आदिग्रंथ साहिब में कुल 5894 शब्द हैं जिनमें से 2218 शब्दों के रचयिता स्वयं पंचम पातशाह हैं। गुरु ग्रंथ साहिब जी में 305 अष्टपदियां, 145 छंद, 22 वारें, 471 पऊड़ी संग्रहित हैं।

समस्त वाणी गायन के लिए है जिसे 31 रागों में गायन करने का विधान है। इसमें प्रमुख विशेषता यह है कि शब्द का गायन किस राग में किया जाए उसका उल्लेख भी साथ किया गया है। इस महान ग्रंथ में पृष्ठों की संख्या 1430 है।

Shri guru granth sahib ka parkash kab huya ?

इस पवित्र ग्रंथ का संपादन करने में श्री गुरु अर्जुन देव जी को 3 वर्ष का समय लगा। श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश श्री हरिमंदिर साहिब में 16 अगस्त, 1604 में किया गया था। पंचम पातशाह ने 3 अक्तूबर, 1588 में मुस्लिम पीर साईं मियां मीर जी से श्री हरिमंदिर साहिब का शिलान्यास करवाया।

आपने 1590 में तरनतारन के सरोवर का निर्माण, 1594 में करतारपुर में थम्म साहिब गुरुद्वारा, 1596 में तरनतारन, 1597 में छेहर्टा साहिब, 1597 में ही श्री हरगोबिंदपुरा, 1599 में लाहौर में बाऊली साहिब और 1602-03 में अमृतसर में अनेक निर्माण कार्य संपन्न कराए।

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मुगल सम्राट जहांगीर श्री गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता के कारण उनसे द्वेषभाव रखने लगा

मुगल सम्राट जहांगीर श्री गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता के कारण उनसे द्वेषभाव रखने लगा था। कश्मीर जाते समय उसने गुरु जी को लाहौर में मिलने को कहा और यह फरमान दिया कि गुरु जी श्री आदिग्रंथ में इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मोहम्मद साहिब की स्तुति में लिखें और इस्लाम धर्म अपना लें।

गुरु जी के इंकार करने पर काजी ने फतवा दिया कि गुरु जी को कष्टदायक मृत्यु की सजा दी जाए। 5 दिन तक गुरु साहिब को खौलते हुए पानी के बड़े कड़ाहे में रखकर ऊपर से गर्म रेत डाली जाती रही लेकिन गुरु जी सहज और शांतिपूर्वक सब यातनाएं झेलते रहे।

5 दिन के पश्चात् राग-रागनियों के मर्मी कलावंत और वाणी के बोहिथ इस महान गुरु ने अविचल भाव से ‘तेरा कीया मीठा लागे, हरिनाम पदार्थ नानक मागे’ गाते प्राण त्याग दिए और शहीदों के सरताज बन गए।

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चौथी पादशाही श्री गुरु रामदास जी के तीन साहिबजादे थे। बड़े पृथीचन्द, दूसरे महादेव तथा तीसरे और सबसे छोटे श्री गुरु अर्जुनदेव जी । पृथीचन्द में भक्तिभाव का पूर्णतया अभाव था। उसके दिल में न तो सद्गुरु जी के प्रति विश्वास और श्रद्धा थी और न ही भजन- न-सुमिरण में उसकी रुचि थी।

उसके विचार पूर्णतया संसारी थे। धन और मान-प्रतिष्ठा से अधिक लगाव था। इसलिये जो भी धन-पदार्थ संगतें श्री सद्गुरुदेव जी के श्री चरणों में भेंट करतीं, उन सबको पृथीचन्द ही सम्भालता। बहुत ही स्वार्थी प्रकृति का व्यक्ति था और स्वयं को अत्यधिक चतुर सयाना समझता था ।

छल-कपट, ईर्ष्या, द्वेष आदि अनेकों अवगुण उसमें विद्यमान थे। अर्थात् उसकी करनी, रहनी, बातचीत, व्यवहार आदि सबमें झूठ ही झूठ था, सत्यता नाम को भी नहीं थी।

दूसरे साहिबजादे महादेव बिल्कुल ही साधु-स्वभाव के और मस्त-मौला थे और सदा अपनी ज़ात में ही लीन रहते थे। न उन्हें खाने-पीने की चिन्ता थी, न ही संसार की कोई दूसरी फिकर। जब दिल चाहा तो कुछ खा लिया, नहीं तो भूखे-प्यासे ही मग्न रहते। बाद में यह विरक्त होकर और घर-बार त्यागकर अन्यत्र चले गये।

श्री गुरु अर्जुनदेव जी का बाल्यकाल

श्री गुरु रामदास जी के तीसरे और सबसे छोटे साहिबजादे थे— श्री गुरु अर्जुनदेव जी । बाल्यकाल से ही सेवा-सुमिरण और भजन में उनकी विशेष रुचि थी और हृदय में श्री सद्गुरुदेव जी के प्रति अटूट श्रद्धा एवं दृढ़ विश्वास |

श्री सद्गुरुदेव जी जो भी कार्य करने के लिये आज्ञा फ़रमाते, आप आज्ञा शिरोधार्यकर बड़े ही उत्साह से उस कार्य को पूरा करने में लग जाते। सच्ची करनी, सच्ची रहनी, अन्दर भी सच, बाहर भी सच और सारा व्यवहार भी सच्चा अर्थात् पूरा जीवन ही सच पर आधारित था, क्योंकि गुरु की प्रतीति हृदय में गहरी थी।

सहारीमल के पुत्र के विवाह

श्री सद्गुरु जी के ताया जी का लड़का था सहारीमल, जो आयु में उनसे बड़ा था और लाहौर में रहता था। सहारीमल के पुत्र के विवाह का समय जब निकट आया तो वह श्री गुरु रामदास जी के चरणों में उपस्थित हुआ जो कि उस समय रामदासपुर में विराजमान थे।

श्री चरणों में पहुँचकर उसने विनती की – “आपके भतीजे (अर्थात् मेरे पुत्र) का विवाह है। आप लाहौर चलने और विवाह में सम्मिलित होने की कृपा करें।”

श्री सद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया – “सहारीमल जी! हम लाहौर जाने और विवाह में सम्मिलित होने को तैयार हैं, परन्तु आप ज़रा इस बात पर विचार करो कि यदि हम बारात के साथ गये, तो लड़की वालों को बहुत परेशानी हो जायेगी, क्योंकि हमें वहाँ पहुँचा जानकर संगतें अवश्य आयेंगी, जिनके रहने और खाने-पीने आदि का प्रबन्ध उन लोगों को ही करना पड़ेगा।

इसलिये हमारा विचार यह है कि आप अपने किसी भतीजे को साथ ले जाओ, हम फिर कभी लाहौर आ जायेंगे।”

सहारीमल सोच में पड़ गया। उसने विचार किया कि सद्गुरु जी की बात तो ठीक है। इनके वहाँ जाने पर हज़ारों श्रद्धालु दर्शन करने के लिये आवेंगे, इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं है।

यह सोचकर उसने विनय की– “आपका कथन सत्य है। अच्छा! आप पृथीचन्द को भेज दो। आप विवाह के बाद ज़रूर दर्शन देने की कृपा करना।”

पृथीचन्द का लाहौर ना जाने का कारण

सद्गुरु जी ने फ़रमाया हुआ तो अवश्य आवेंगे।” “यदि करतार का हुकुम पृथीचन्द और उसकी पत्नी करमकौर को जब इस बात का पता चला कि श्री सद्गुरुदेव जी और सहारीमल ने पृथीचन्द का लाहौर जाने का प्रोग्राम बनाया है, तो दोनों आपस में परामर्श करने लगे।

पृथीचन्द की तरह ही करमकौर भी बड़ी स्वार्थी और स्वयं को बहुत चतुर समझती थी। उसने पृथीचन्द से कहा- “आप लाहौर बिल्कुल नहीं जाना।

मैंने सुना है कि आपके पिता अपना उत्तराधिकारी घोषित करनेवाले हैं। यह भी उनकी चाल मालूम होती है, जोकि वे आपको लाहौर भेज रहे हैं। आप कोई न कोई बहाना करके मना कर देना और अर्जुनदेव जी को लाहौर भिजवाने की कोशिश करना।”

पृथीचन्द ने उत्तर दिया- “तुम चिन्ता मत करो। मैं सबकुछ समझता हूँ। में किसी सूरत में भी लाहौर नहीं जाऊँगा। सवेरे जब पिता जी बात करेंगे, तब निपट लूँगा।”

ऊपर की बातों से पाठकगण स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि दोनों किस प्रकार के विचारों के थे। वे श्री गुरु रामदास जी को सद्गुरु न समझकर मात्र पिता ही समझते थे। ऐसे लोगों के विषय में परमसन्त श्री कबीर साहिब जी ने फ़रमाया है कि:

॥ दोहा ।।

गुरु मानुष करि जानते, ते नर कहिये अंध । महा दुःखी संसार में, आगे जम के फंध ॥

पृथीचन्द और करमकौर की बातों से यह भी स्पष्ट प्रकट होता है कि श्री सद्गुरु जी के प्रति उनके दिल में श्रद्धा और विश्वास का नितान्त अभाव था।

इसके अतिरिक्त उनकी बातों से यह भी साफ़ प्रकट होता है कि उनमें भक्तिभाव बिल्कुल नहीं था। श्री सद्गुरु जी की प्रसन्नता एवं कृपा प्राप्त करने की अपेक्षा अपनी स्वार्थसिद्धि की ओर उनका अधिक ध्यान था और इसके लिये वे सद्गुरु की आज्ञा की अवज्ञा करने को भी तत्पर थे।

दूसरे दिन सवेरे नित्य नियम के पश्चात् श्री गुरु रामदासजी ने पृथीचन्द को बुलवाया और फ़रमाया- “बेटा! अपने ताया जी के साथ लाहोर चले जाओ और अपने भाई की शादी में सम्मिलित होवो।

हमारा जाना ठीक नहीं, क्योंकि हमारे जाने से वहाँ संगत इकट्ठी हो जायेगी। इसलिये तुम चले जाओ, पाँच-सात दिन लगाकर आ जाना।”

पृथीचन्द तो पहले ही इनकार करने का निर्णय ले चुका था। अतः उसने बहाना बनाते हुए कहा – “पिता जी! आप देखते ही हैं कि सारी सेवा-भेंट में ही सम्भालता हूँ, दर्शन हेतु बाहर से आनेवाले यात्रियों के रहने और भोजन आदि का प्रबन्ध भी मुझे ही करना पड़ता है और खेती-बाड़ी की देख-भाल भी में ही करता हूँ

मेरा जाना तो बिल्कुल ही सम्भव नहीं है। महादेव वैसे ही मस्तमौला है, उसको इस बात का कोई ज्ञान ही नहीं कि संसार में किस तरह बरतना है। इसलिये अच्छा यही है कि आप अर्जुनदेव को भेज दें। वैसे भी वह कोई काम-धाम तो करता नहीं, सारा दिन खाली ही बैठा रहता है। “

पृथीचन्द का ऐसा उत्तर सुनकर श्री सद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया– “ठीक है बेटा! उन्हीं को भेज देते हैं। तुम जाओ अपना काम-धन्धा करो।”

पृथीचन्द तुरन्त वहाँ से खिसक गया। श्री गुरु रामदास जी कुछ पल तो नयन मूँदकर कुछ सोचते रहे, फिर श्री अर्जुनदेव जी को बुलवा भेजा।

श्री सद्गुरुदेव जी का श्री अर्जुनदेव जी को लाहौर जाने की आज्ञा देना

पहले लिखा जा चुका है कि श्री अर्जुनदेव जी के दिल में श्री सद्गुरुदेव जी के प्रति दृढ़ प्रतीति एवं अटूट श्रद्धा थी। उन्होंने आते श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया, फिर दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त नम्रता से पूछा- “पिता जी! क्या आज्ञा है?”

श्री सद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया- “बेटा! तुम्हें पता ही है कि तुम्हारे ताया जी लाहौर से आये हुए हैं, क्योंकि उनके सुपुत्र अर्थात् तुम्हारे भाई का विवाह है, इसलिये इनके साथ चले जाओ। किन्तु एक वचन हमारा याद रखना कि जब तक हम आज्ञा न भेजें, वापस न आना।”

श्री अर्जुनदेव जी ने विनय की – “जो आज्ञा पिता जी! मैं अभी तैयार होकर आया। “

यह कहकर श्री अर्जुनदेव जी वहाँ से चले गये और कुछ ही देर में तैयार होकर पुनः वहाँ आ गये, जहाँ श्री सद्गुरुदेव जी विराजमान थे।

तब श्री सद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया – “बेटा! दुनियादारी के कारज करते हुए और विवाह की खुशियों में कहीं परमेश्वर को मत भूल जाना। हर पल उसका सुमिरण करते रहना ।

श्री अर्जुनदेव जी का लाहौर जाना

नाम-सुमिरण करते हुए ही संसार के कार्य शोभाजनक एवं सुखदायी होते हैं, अन्यथा नरकरूप एवं दुःखदायी हो जाते हैं।”श्री अर्जुनदेव जी ने श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में प्रणाम किया और उनकी शिक्षा और आशिष् लेकर सहारीमल के साथ लाहौर के लिये प्रस्थान किया।

सहारीमल के लड़के का विवाह हो गया। सब रिश्तेदार-सम्बन्धी अपने-अपने घर वापस चले गये। परन्तु श्री अर्जुनदेव जी वापस रामदासपुर न गये, क्योंकि सद्गुरु जी का वचन था कि ‘जब तक हम आज्ञा न भेजें, वापस न आना।

ऐसी आज्ञा उन्होंने क्यों की ?

यह तो उस समय श्री सद्गुरुदेव जी ही जानते थे। परन्तु आगे की कथा -पाठक इस रहस्य को समझ जायेंगे कि ऐसा पढ़कर प्रेमी उन्होंने सच को सच और झूठ को झूठ सिद्ध करने तथा संगत पर यह प्रकट करने के लिये किया कि उनके रूहानी जानशीन होने के योग्य वास्तव में श्री अर्जुनदेव जी ही हैं।

श्री अर्जुनदेव जी लाहौर रहकर आज्ञा की प्रतीक्षा करना

श्री अर्जुनदेव जी लाहौर रहकर आज्ञा की प्रतीक्षा करते रहे, परन्तु श्री सद्गुरुदेव जी की ओर से कोई आज्ञा न आयी। इसी तरह लगभग तीन महीने बीत गये।

वह वैसाख में लाहौर गये थे- वहाँ वैसाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ बीत गया। परन्तु आज्ञा न आयी। अब गुरु दर्शन के बिना उनका एक-एक पल व्याकुलता में बीतने लगा। मन करता कि उड़कर श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में पहुँच जायें, परन्तु श्री सद्गुरुदेव जी का वचन उन्हें रोके हुए था।

अन्ततः व्याकुलता सीमा पार कर गयी। उनसे रहा न गया और उन्होंने श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में विनय-पत्र लिखा, जिस पर नम्बर एक डाला।

उस पत्र में उन्होंने अपने मन के भावों को इन शब्दों में प्रकट किया

(1)

मेरा मन लोचै गुर दरसन ताई ॥

बिलप करे चात्रिक की निआई ॥

त्रिखा न उतरै साँति न आवै ॥

बिनु दरसन संत पिआरे जीउ ॥ १॥

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई ॥

गुर दरसन संत पिआरे जीउ ॥ १ ॥ रहाउ ॥

(गुरुवाणी)

अर्थः – “मेरा मन गुरु के दर्शन के लिये अति व्याकुल है और चात्रिक की न्याई विलाप करता है। हे सन्तरूप प्रियतम जी! आपके दर्शन के बिना मन की प्यास नहीं बुझती और मन को शान्ति नहीं आती। हे सन्त प्यारे जी! मैं आपके दर्शन के लिये मन, वाणी, काया से बलिहार जाता हूँ।

श्री गुरु अर्जुन देव का श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में पत्र लिखना

यह विनती -पत्र लिखकर आपने एक सिख को देते हुए कहा कि तुम तुरन्त रामदासपुर चले जाओ और यह विनती-पत्र श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में पहुँचा दो।

विनती पत्र लेकर वह सिख तुरन्त वहाँ से चल पड़ा। लाहौर से रामदासपुर की दूरी पैंतीस मील थी। जब वह सिख वहाँ पहुँचा शाम हो चुकी थी। आगे पृथीचन्द का राज्य था।

उसने अनेकों मसन्दों और सेवकों को अपने पक्ष में किया हुआ था। उसने उन्हें अच्छी तरह समझा भी रखा था कि कोई सिख यदि लाहौर से कोई सन्देशा लाये, तो उसे सीधे श्री सद्गुरुदेव जी के पास मत ले जाना।

जब वह सिख वहाँ पहुँचा तो एक मसन्द ने उससे पूछताछ की और वह विनती पत्र उससे लेकर कहा- -“यह चिट्ठी श्री सद्गुरुदेव जी तक पहुँच जायेगी, तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो।

तुम थके हुए हो, नहा-धोकर लंगर का प्रसाद ग्रहण करो और फिर आराम करो। सुबह श्री सद्गुरुदेव जी के दर्शन करके वापस चले जाना।”

उस भोले सिख ने उस मसन्द की बातों पर विश्वास कर लिया। उस बेचारे को क्या पता था कि पृथीचन्द ने अन्दर ही अन्दर क्या खेल रचा रखा है।

वह सिख तो स्नान आदि करने चला गया और उस मसन्द ने वह चिट्ठी पृथीचन्द को पहुँचा दी। पृथीचन्द ने चिट्ठी पढ़कर चोले की जेब में रख ली; श्री सद्गुरुदेव जी तक न पहुँचायी।

वह सिख दूसरे दिन श्री सद्गुरुदेव जी के दर्शन करके वापस लाहौर चला गया और श्री अर्जुनदेव जी के चरणों में सब वृत्तान्त प्रस्तुत किया।

कुछ दिन तक तो वे इस बात की प्रतीक्षा करते रहे कि श्री सद्गुरुदेव जी की तरफ से अब उत्तर आया, अब उत्तर आया। परन्तु कई दिन बीत गये, तो उन्होंने दूसरा विनय पत्र लिखा। उस पत्र पर नम्बर दो डाला और उसमें हृदय की भावनाओं को इन शब्दों में प्रकट किया:

(2)

तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि बाणी ॥

चिरु होआ देखे सारिंगपाणी ॥ धंनु सु देसु जहा तू वसिआ ॥मेरे सजण मीत मुरारे जीउ ॥ २ ॥

हउ घोली जिउ घोलि घुमाई गुर सजण मीत मुरारे जीउ ॥ १॥ रहाउ |

(गुरुवाणी)

अर्थः – “तेरा मुख सुन्दर एवं शोभनीय है और वाणी सहज ही अमृतमय और शान्तिरूप है । हे भगवन् ! आपके दर्शन किये चिरकाल हो गया है। हे मेरे सज्जन ! हे मेरे प्यारे प्रभु जी! वह देश धन्य है, जहाँ आप निवास कर रहे हैं। हे सज्जन गुरुदेव! हे मेरे प्यारे प्रभो जी! मैं मन, तन और वाणी से आप पर बलिहार जाता हूँ।”

श्री गुरु अर्जुन देव का श्री सद्गुरुदेव जी को दूसरी बार विनय पत्र भेजना

विनय पत्र लिखकर उन्होंने एक अन्य सिख को दिया और उस पत्र को श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों तक पहुँचाने के लिये कहा। किन्तु वह पत्र भी पृथीचन्द के ही हाथ लगा; श्रीसद्गुरुदेव जी तक वह पत्र भी न पहुँचा। कुछ दिन प्रतीक्षा करने के उपरान्त श्री अर्जुनदेव जी ने तीसरा विनय पत्र यूँ लिखाः

(3)

इक घड़ी न मिलते ता कलिजुगु होता । हुणि कदि मिलीऐ प्रिअ तुधु भगवंता ।।

मोहि रैणि न विहावे नींद न आवे ॥ बिनु देखे गुर दरबारे जीउ ॥ ३ ॥

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई तिसु सचे गुर दरबारे जीउ ॥ १ ॥ रहाउ ।।

(गुरुवाणी)

अर्थः – “एक घड़ी दर्शन न होने पर तो समय कलियुग बन जाता है अर्थात् बिछोह की एक घड़ी कलियुग की तरह अर्थात् अत्यन्त दुःखद हो जाती है। हे प्यारे भगवन् जी! अब आपको कब मिलूँगा? गुरु दरबार को देखे बिना मुझे नींद नहीं आती और न ही मेरी रात चैन से बीतती है। मैं मन, तन और वाणी से गुरुदेव पर बलिहारी जाता हूँ जिसका दरबार सच्चा है। “

श्री अर्जुनदेव जी ने सिख के हाथ में विनय पत्र देते हुए कहा –यह पत्र केवल श्री सद्गुरुदेव जी को ही देना।

इस बार श्री अर्जुनदेव जी ने सिख के हाथ में विनय पत्र देते हुए कहा – “हमारी बात ध्यानपूर्वक सुनो। इस पत्र को सिवाय श्री सद्गुरुदेव जी के न किसी को दिखाना और न ही देना, बल्कि इसके बारे में किसी से ज़िकर भी न करना। यह पत्र केवल श्री सद्गुरुदेव जी को ही देना।”

इस तरह ताकीद करके उसे रामदासपुर की ओर रवाना किया। जब वह सिख रामदासपुर पहुँचा, श्री सद्गुरुदेव जी का दरबार लगा हुआ था। संयोग से उस समय पृथीचन्द वहाँ उपस्थित नहीं था, अन्य किसी ने उससे किसी प्रकार की कोई पूछताछ नहीं की।

उसने आगे बढ़कर श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में मस्तक नवाया और श्री अर्जुनदेव जी का पत्र श्रीसद्गुरुदेव जी के कर-कमलों में पकड़ा दिया। श्री सद्गुरुदेव जी ने पत्र पढ़ा। पत्र का नम्बर देखा जो तीन था, फिर बोले- “अच्छा! दो पत्र पहले भी उन्होंने भेजे हैं, परन्तु हमें तो कोई पत्र उनका नहीं मिला। “

यह कहकर अन्तर्यामी, घट-घट की जाननेवाले श्री – “पृथीचन्द को सद्गुरुदेव जी ने एक सेवक को फ़रमाया- ‘ शीघ्र बुला लाओ। पहले दोनों पत्र उसीके पास होंगे।”

श्री सद्गुरुदेव जी का पृथीचन्द से पहले दो पत्र के बारे में पूछना

परमात्मा की मौज उस समय कुछ ऐसी हुई कि पृथीचन्द स्वयं ही दरबार में आ उपस्थित हुआ। श्री सद्गुरुदेव जी ने पूछा- “बेटा पृथीचन्द ! लाहौर से अर्जुनदेव जी की कोई चिट्ठी आयी है? वे पहले दो पत्र भेज चुके हैं।”

पृथीचन्द के दिल में चूँकि श्री सद्गुरुदेव जी के प्रति प्रतीति, प्रीति, श्रद्धा अथवा भक्तिभाव बिल्कुल नहीं था, अतः श्री सद्गुरुदेव जी के पूछने पर भी वह झूठ बोलने से बाज़ न आया ।

उसने उत्तर दिया- “नहीं पिता जी! मुझे तो भाई की कोई चिट्ठी नहीं मिली।”

श्री सद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया- “अच्छा! तुम यहीं बैठो। हम भाई बल्लू को भेजकर तुम्हारा चोला मँगवाते हैं।”

यह कहकर श्री सद्गुरुदेव जी ने भाई बल्लू को पृथीचन्द के निवास स्थान पर भेजा। वह पृथीचन्द के घर से उसका चोला उठा लाया, जिसकी तलाशी लेने पर जेब से दोनों पत्र निकल आये।

श्री सद्गुरुदेव जी ने दोनों पत्र पृथीचन्द को दिखाते हुए फ़रमाया- “पिता और छोटे भाई के साथ धोखा! ऐसा क्यों? किस कारण यह झूठ बोलना पड़ा?”

पृथीचन्द का सारा भेद खुल गया। वह झुंझलाकर श्री सद्गुरुदेव जी के आगे बहुत कुछ अंट-संट बोलने लगा और फिर बाहर निकल गया। यह सबकुछ भरे दरबार में हुआ। वहाँ उपस्थित सारी संगत पृथीचन्द की हरकतें देखकर उसकी निंदा करने लगी।

श्री अर्जुनदेव जी को बड़े सम्मानपूर्वक लाहौर से बुलवाया

श्री अर्जुनदेव जी को बड़े सम्मानपूर्वक लाहौर से बुलवाया गया। दूसरे दिन श्री अर्जुनदेव जी रामदासपुर पहुँचे और आते ही श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में गिर पड़े और प्रेमाश्रुओं से उनके चरण पखारने लगे। श्री सद्गुरुदेव जी ने उन्हें उठाकर अपने सीने से लगा लिया।

पृथीचन्द को यह भनक तो पड़ ही गयी थी कि श्री सद्गुरुदेव जी श्री अर्जुनदेव जी को गुरु-गद्दी का उत्तराधिकारी घोषित करनेवाले हैं, अतः अगले दिन जबकि श्री सद्गुरुदेव जी का दरबार लगा हुआ था, तो पृथीचन्द फिर वहाँ आकर यूँ बोलने लगा — “मैं आपका बड़ा पुत्र हूँ, इसलिये गुरु गद्दी की हक मेरा है। और भी बहुत कुछ बोला ।”

गद्दी का वारिस घोषित करना

श्री गुरु रामदास जी शान्तचित्त बैठे उसकी बातें सुनते रहे। जब वह बोल चुका, तो श्रीसद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया- “अर्जुनदेव ने अपने पत्रों में शब्द के तीन पद उच्चारे हैं, चौथा पद तुम रचकर शब्द पूरा कर दो, गद्दी का वारिस तुम्हें घोषित किया जायेगा।”

लेकिन जिसके दिल में अपने श्री सद्गुरुदेव जी के प्रति प्रतीति, प्रीति, श्रद्धा और भक्तिभाव का पूर्णतया अभाव हो; अपितु छल, कपट, ईर्ष्या, विद्वेष आदि अवगुण भरे हों, वह रब्बी वाणी का उच्चारण भला कहाँ कर सकता है ?

पृथीचन्द कुछ देर तक तो सोचता रहा, परन्तु जब कुछ समझ न आया तो यह कहते हुए दरबार से चला गया कि यह काम मेरे से नहीं हो सकता।

उसके चले जाने के बाद श्री सद्गुरुदेव जी ने श्री अर्जुनदेव जी को आज्ञा दी कि वह चौथा पद उच्चारकर शब्द पूरा करें। उससमय उन्होंने यह पद उच्चारण किया

(4)

भागु होआ गुरि संतु मिलाइआ ||

प्रभु अबिनासी घर महि पाइआ ।

सेव करी पलु चसा न विछुड़ा || जन नानक दास तुमारे जीउ ॥ हउ घोली जीउ घोलि घुमाई ॥ ४ ॥

जन नानक दास तुमारे जीउ | रहाउ ॥

(गुरुवाणी)

अर्थ:- “जब भाग्य उदय हुआ अर्थात् पुण्यकर्म फल देने पर आये, तब सन्तरूप गुरु का मिलाप हुआ और घर में ही (घट में) अविनाशी प्रभु को पा लिया। अब सदा आपकी सेवा करता रहूँ, पल भर अथवा क्षणभर भी आपसे न बिछहूँ, यही विनय है। मैं आपका दास हूँ। श्री गुरु अर्जुनदेव जी कथन करते हैं कि मैं मन, वाणी और काया से उन पर बलिहार जाता हूँ, जो आपके दास हैं।”

गुरुगद्दी का उत्तराधिकारी श्री अर्जुनदेव जी को घोषित करना

यह पद सुनकर श्री सद्गुरुदेव जी अति प्रसन्न हुए और उसी दिन शाम को गुरुगद्दी का उत्तराधिकारी श्री अर्जुनदेव जी को घोषित कर दिया।

इस कथा से पाठकजन स्वयं अनुभव कर सकते हैं कि जिसके मन में सद्गुरु की प्रतीति अर्थात् दृढ़ विश्वास होता है, उसका पूरा जीवन ही सत्य पर आधारित होता है। ऐसे मनुष्य का तन, मन निर्मल होता है और इस कारण वह सहज ही इष्टदेव को प्रिय होता है।

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