युवक की देशभक्ति – inspirational story

एक युवक की देशभक्ति

स्वामी विवेकानन्द उन दिनों एक देश से दूसरे देश की यात्रा पर थे।

इसी दौरान वे जापान की यात्रा पर गये। जापान के अनेक स्थानों का भ्रमण स्वामी जी ने किया। एक दिन वे ट्रेन में बैठकर जापान के किसी शहर जा रहे थे।

रास्ते में उनकी इच्छा हुई कि फलाहार किया जाए। उन्होंने बीच के अनेक स्टेशनों पर फलों की खोज की, किंतु कहीं भी फल उपलब्ध नहीं हुए।

स्वामी जी कुछ निराश हो गये और उनके मुँह से अनायास निकल पड़ा- ‘यह कैसा देश है, जहाँ फल भी नहीं मिलते ?”

यह बात उनके पास बैठे जापानी युवक को बहुत बुरी लगी। वह जानता था कि फल कहाँ मिलते हैं।

अगले स्टेशन पर वह उतरा और स्वामी जी के लिये ढेर सारे फल लेकर आया। उसने अत्यन्त स्नेह से वे फल स्वामी जी को भेंट किये। स्वामी जी ने उसे हृदय से धन्यवाद दिया और फलों के दाम पूछे, किंतु युवक ने उत्तर नहीं दिया। तब स्वामी जी ने उससे कहा- ‘देखो भाई! संकोच मत करो।

तुम इनकी कीमत चुकाये बगैर तो इन्हें लाये नहीं हो। इसलिये बेझिझक इनकी कीमत बता दो, वरना इन फलों का सेवन करना मेरे लिये मुश्किल हो जाएगा।’

तब युवक ने बड़ी ही विनम्रता से कहा-‘स्वामीजी! इसका मूल्य यह है कि आप अपने देश में जाकर यह न कहें कि मेरे देश जापान में फल नहीं मिलते।’ यह सुनकर स्वामी जी जापानी युवक की देशभक्ति के कायल हो गये। कथा का सार यह है कि अपने देश की प्रतिष्ठा की किसी भी रूप में रक्षा करना देशभक्ति है, जो प्रत्येक नागरिक का परम दायित्व है।

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