Bhakti ! भक्ति क्या है और कैसे पैदा होती है?

भक्ति क्या है

भक्ति क्या है

भक्ति क्या है ? अपने अंदर भक्ति कैसे पैदा करें ?

भक्ति का सवाल आम लोगों के ख्याल में आसान और मामूली मालूम हो परन्तु जो समझने वाले हैं, वे इसको किसी और ही निगाह से देखते हैं।

कम से कम उनके सामने इसका जवाब ज़रूरी समझा जाता है और संसार में आम तौर पर जहाँ जहाँ भी भक्ति के कारोबार का सिलसिला दिखाई देता है, सब किसी ने अपने अपने ख्याल के अनुसार कोई न कोई इष्ट कायम किया हुआ है।

जिसकी सेवा-पूजा वे सदा करते रहते हैं और इस ख्याल से वे सब ही भक्त कहे जाते हैं। हम इस बात के विरुद्ध नहीं कि वे क्यों अलग अलग रास्ते अख्त्यार किए बैठे हैं। और क्यों उस मालिक की प्राप्ति के वास्ते एक ही मार्ग पर नहीं चलते।

क्योंकि दुनिया में ख्यालात, विश्वास, समझ बूझ और संस्कार सबके जुदा जुदा हैं और हम यह भी नहीं कहते कि उनमें भक्ति नहीं। मगर इतना ज़रूर कहना पड़ता है कि उनकी भक्ति निचले दर्जे की और अधूरी है, आला दर्जे की भक्ति वह नहीं। क्योंकि उनके दरमियान अक्सर यह नुक्स रहता है कि वह किसी न किसी संसारी कामना को सामने रखकर इष्ट की पूजा करते हैं और

भक्ति सदा निष्काम हुआ करती है, उसके अन्दर सिवाय • खालिस प्रेम के और कुछ भी समा नहीं सकता, इसलिए जहाँ कामना हुई वहाँ भक्ति का आना असम्भव है। क्योंकि प्रेमी का असूल अपने प्रियतम पर कुर्बान होने का है, कुछ माँगने का नहीं। इस वास्ते जहां कामना का सवाल पैदा हुआ तो जान लो वह असल भक्ति नहीं है। एक बात तो यह हुई।

दूसरी बात यह है, मान लो यह दोष उसके अंदर न भी हो तो भी इस तरीके से असल भक्ति तक पहुँचना मुश्किल है। क्योंकि यह सब निशाने ख्याली कायम किये गये हैं और मनमति अनुसार हैं।

इन सब रास्तों में राहनुमाई मन की है। जिसके ख्याल ने जिसको अच्छा पसन्द किया, उसने वही अपना इष्ट बांध लिया जिस तरीके से अपने मन ने रास्ता बताया उसी के मुताबिक वह उसकी पूजा करता रहा। और मन खुद माया के दायरे के अन्दर है।

इसकी समझ बूझ की पहुँच चाहे कितनी दूरदराज़ की हो आखिर काल माया की हद से बाहर न होगी। मन जो कुछ भी सोचेगा, माया के अन्दर सोचेगा। क्योंकि वह खुद माया के मसाले से बना है।

जो चीज़ जिससे तैयार हुई होती है, हमेशा उसमें उसी का गुण रहता है। मन चूँकि खुद माया से घड़ा गया है, इस वास्ते इसकी राहबरी भक्त को माया से बाहर नहीं जाने देगी।

दूसरे, मन का यह भी स्वभाव है कि वह हमेशा एक जगह पर कायम नहीं रहा करता और न सदा के लिए एक चीज़ को पसन्द ही करता है। उसकी आदत है आज अगर वह एक चीज़ के साथ प्यार करता है तो कल उससे नफरत करने लग जाता है। इसी प्रकार कई तबदीलियाँ उसके अन्दर आती रहती हैं।

जिस कारण से मनुष्य अपने असली मकसद को न हासिल करके हमेशा कलपना और परेशानी का शिकार बना रहता है।

भला जहां कलपना हो वहां भक्ति कहां? भक्ति सदा दिल को एकाग्रता और यकरुखी की ताकत बख्शती है। जगह बजगह फिरने का नाम भक्ति नहीं। इस वास्ते भक्त को यह हिदायत दी गई है।

|| दोहा ||

एक नाम को जानि करि, दूजा देइ बहाय । जप तप व्रत संयम नहीं, सतगुरु चरन समाय ॥

जब तक ऐसा नहीं होता तब तक सच्ची भक्ति का बीज पैदा नहीं होता और न दिल के अन्दर नेक और पवित्र संस्कारों के उभरने का मौका ही मिलता है। हम किसी पर एतराज क्यों करें, आखिर वह कुछ न कुछ कर ही रहे हैं।

बिल्कुल न करने से तो यह अच्छा है, मगर जिसका नाम भक्ति है, वह कुछ और चीज़ है। संसार में जितने भी साधु, सन्त, भक्त, महात्मा, ऋषि, मुनि, अवतार और पैग़म्बर आये; वे सब भक्ति का राग अलापते रहे। कबीर साहिब, नानक साहिब, दादू दयाल, तुलसीदास,

नामदेव, सैना, सदना, पीपाजी और सूरदास आदि ये सब भक्ति के ही गीत को गाते रहे। जिनको संसार से कूच किये हुए हज़ारों लाखों बरस गुज़र गए हैं मगर अब तक उनके रूहानी झंडे मज़बूती के साथ गढ़े हैं।

वह कौन सी भक्ति की ताकत है जिसके कारण दुनिया आज तक उनको अज़मत की निगाह से देखती और पूजती चली आती है। संसार में दुनियावी तरक्कियों की लहरें कई बार आई और मिट गईं, करोड़ों राजे और बादशाह हो गुज़रे मगर अब उनकी अदम मौजूदगी में उन का नाम भी कोई नहीं जानता।

परन्तु उन भक्ति के वारिसों को लोग अभी तक याद करते हैं और करते रहेंगे। क्या वह यही भक्ति थी जिसको दुनिया आम तौर पर करती है, या और थी ? भक्ति मार्ग पर चलने से पहले भक्त को इस सवाल का हल कर लेना बहुत ज़रूरी है, वरना वक्त गुज़र जाएगा और जो लाभ होना चाहिए, वह नहीं होगा।

॥ दोहा ||

भक्ति प्रान तें होत है, मन दे कीजै भाव । परमारथ परतीत में, यह तन जाव तो जाव ॥

भक्ति का सम्बन्ध दिल से है। वह हमेशा दिल की कुर्बानी माँगती है। इसलिए जिसके दिल में जिस चीज़ का प्यार है वह उसी का भक्त समझना चाहिए। अर्थात् दिल के अन्दर स्त्री का ध्यान है तो स्त्री उसका इष्ट है और वह स्त्री का भक्त है।

अगर पुत्र का ध्यान है तो पुत्र का भक्त है। अगर दोस्त का ध्यान है तो दोस्त का भक्त है। अगर दिल के अन्दर रुपये पैसे का नक्शा जमा हुआ है तो वह रुपये पैसे का उपासक है।

मतलब यह है कि दिल के खाने में जिस चीज़ की मुहब्बत ने घर किया हुआ है और जिसके चेहरे की अक्सी सूरत हर वक्त दिल में जमी रहती है, वही उसका इष्ट है और वही उसके दिल की तमाम ताकतों का निशाना बना हुआ है और उसी का वह पुजारी है।

इसी तरह अगर दिल के अन्दर गुरु की मूर्ति का ध्यान है तो वह गुरु का भक्त है। यह एक हकीकत है जिस का समझना कोई मुश्किल नहीं। समझ-बूझ वाले इन्सान इसके मानने में इनकार भी नहीं करेंगे।

क्योंकि यह कुदरती कायदा है कि जो जिस का ध्यान करता है वह उसी को पहुँचता है। जिसको हर घड़ी याद किया जाता है वह एक दिन अपने प्रेमी को अपने पास बुला लेता है। यह ध्याता, ध्यान और ध्येय का तरीका है, जिसके ज़रिये ध्याता ध्यान में और ध्यान ध्येय में जा लीन होते हैं। ये तीनों इन्तहाई मंज़िल पर पहुँच कर एक हो जाते हैं।

दुनिया में अक्सर देखा जाता है कि हर काम की पूर्ति के लिए तीन चीज़ों की ज़रूरत रहती है। जैसे-मरीज़, दवाई और डॉक्टर । विद्यार्थी, विद्या और अध्यापक । ग्राहक, सौदा और दुकानदार प्रेमी प्रेम और प्रियतम दानी,दान और दान पात्र।

देखने वाला, आँख और देखने की चीज़। इसी तरह भक्ति के मार्ग में भी तीन चीजें दरकार होती हैं–भक्त, भक्ति और भगवन्त । भक्त भक्ति करने वाला है, भगवन्त वह जिसकी भक्ति की जाती है और भक्ति वह है जिसके ज़रिये भक्त भगवन्त से जा मिलता है।

भक्ति के रास्ते में इन तीनों का होना ज़रूरी है। जो हमेशा अजर, अमर, अविनाशी और आनन्द स्वरूप मालिक कुल है, उसके साथ ताल्लुक पैदा करना उसकी मुहब्बत का दम भरना सच्ची भक्ति कहलाता है। जब तक उस प्रियतम का प्रेम मुकम्मल न हो, जब तक दिल की तमाम ताकतें उस पवित्र ज्योति के इर्द गिर्द चक्कर न लगायें, भक्ति पूरी नहीं होती।

वास्तव में भक्ति उस मालिक की सच्ची तलाश का नाम है। जिसके आदि, अन्त और मध्य में प्रेम ही प्रेम भरा रहता है। वह प्रेम से पैदा होती, प्रेम में रहती और प्रेम ही में उसका ख़ात्मा होता है।

चूँकि मालिक खुद प्रेम स्वरूप है, इसलिए प्रेमी के साथ उसका प्यार है। हमजिस का हमजिस के साथ प्यार होना ज़रूरी है। प्रेमी भक्त मालिक का हमजिस होता है।

उसमें और मालिक में कोई भेद नहीं होता, क्योंकि जब भक्त के दिल में प्रेम भक्ति का बीज पैदा हो जाता है, उस वक्त उसके दिल में वह मालिक अन्तर्यामी वास करने लग जाता है और जिस समय हृदय में मालिक का निवास होने लगता है, अज्ञान का अन्धकार खुद बखुद दूर होने लग जाता है और दिल के अन्दर उस मालिक की पवित्र ज्योति का प्रकाश हो जाता है।

जब कुल अन्धेरा दूर हो जाता है तो उस वक्त उसके सामने ज़िन्दगी और मौत का सवाल हल हो जाता है और वह समझ जाता है— मौत क्या चीज़ है और ज़िन्दगी क्या वस्तु है। प्रेम की अग्नि से उसके कुल बन्धन जल जाते हैं और वह पवित्र और स्वच्छ होकर मालिक के निज प्यारों में शुमार हो जाता है।

॥ दोहा ||

प्रेम बिना जो भक्ति है, सो निज दम्भ विचार । उदर भरन के कारने, जन्म गँवायो सार ॥

यह तो बता दिया गया कि भक्ति वास्तव में क्या चीज़ है।

अब रही यह बात कि उसकी पैदायश किस तौर पर होती है।

भक्ति की प्राप्ति का दारोमदार भी इन्सान के अपने ही ऊपर है। यह खुद ही भक्ति के बीज को बोने वाला और खुद ही उसे तरक्की देने वाला है। भक्ति नाम मुहब्बत या प्रेम का है।

प्रेम दुनियावी हो या हकीकी, दोनों के पैदा करने वाला मनुष्य आप ही है। ज़रा तुम अपने रोज़ाना वाक्यात पर निगाह डालो, मुहब्बत के पैदा होने का सारा नक्शा तुम्हारी आँखों के सामने आ जायेगा।

इस शरीर के द्वारा तुम जो चीज़ पैदा करते हो उसमें तुम्हारा आपाभाव होता है और तुम उसे अपना समझ कर उसके साथ मुहब्बत रखते हो, चाहे दौलत है, चाहे ज़मीन है, चाहे कपड़ा है, चाहे रुपया पैसा या कोई और चीज़ है। उनके साथ हमारी मुहब्बत क्यों है? हमने उनके लिए।

मुशक्कत उठाई है। इस जिस्म की कमाई का हिस्सा उन पर लगाया है, इसलिए वे हमको प्यारे हैं। अर्थात् इस शरीर के द्वारा जिस जिस वस्तु की खातिर भी कर्म किये जाते हैं, उनको हासिल करने में यत्न किया होता है, उन चीज़ों के साथ प्यार हो जाता है और आदमी उनको अपना समझने लगता है।

मगर जिस वक्त वह प्यारी चीजें किसी दूसरी जगह खर्च हो जाती हैं तो वही दिली मुहब्बत वहाँ तबदील हो जाती है और आगे के लिए आदमी के ख्याल का निशाना वह जगह बन जाती है, जहाँ उसकी प्यारी चीजें खर्च हुई हों।

मिसाल के तौर पर एक दौलत को ही ले लो। उसको तुमने बड़ी मेहनत से हासिल किया है। घर के अन्दर जहाँ वह रखी होती है, हर समय उसकी तरफ ख्याल लगा रहता है कि कहीं उसे कोई उठा न ले जाये। चोर चकार से बचाये रखने की फिकर लगी रहती है।

लोहे के सन्दूकों के अन्दर बन्द किया जाता है। दिन रात दिल के अन्दर उसी का ध्यान आता रहता है। दिल की तमाम ताकतें उस के इर्द गिर्द चक्कर लगाती रहती हैं।

क्यों? उसको इकट्ठाकरने में तुमने कर्म किये हैं, वक्त दिया है, मुशक्कत उठाई है। इस वजह से तुम्हारा दिल वहाँ फँस रहा है और ऐसा फँसा है कि निकालने से भी नहीं निकलता लेकिन अगर सी रुपये से तुम कोई व्यापार का काम शुरु कर दो और उस रुपये के बदले में कपड़ा, गेहूँ या कपास वग़ैरह खरीद कर लो तो आइन्दा के लिए तुम्हारी मुहब्बत और मोह का निशाना वह ख़रीदी हुई चीज़ें कपास, गेहूँ, कपड़ा वगैरह हो जायेंगी। रुपये की सारी मुहब्बत पूरे तौर पर उन चीज़ों में तबदील हो जायेगी।

फिर आठों पहर रुपये की बजाय उन चीज़ों का ध्यान रहने लगेगा। या यदि वही रुपया तुम अपने लड़के की परवरिश, तालीम या शादी वग़ैरह पर ख़र्च कर देते हो, या स्त्री के हार- -शृंगार में लगा देते हो, या किसी दोस्त की ख़ातिर खिदमत में खर्च हो जाता है तो रुपये की कुल मुहब्बत उनके जिस्म में चली जाती है। कुछ उनके साथ पहले थी और कुछ रुपये की कुर्बानी की, ये दोनों मुहब्बतें एक जगह इकट्ठी हो जाने पर एक नई शक्ल अख्त्यार कर लेती हैं।

नतीजा यह होता है कि उनके साथ पहले से कई गुना ज़्यादा मोह बढ़ जाता है। ये हालतें रोज़ तुम्हारी नज़रों के सामने से गुज़रती रहती हैं और तुम को इनका अच्छा खासा अनुभव है।

यह दुनिया एक बाज़ार है, इसके अन्दर सब लोग सौदा खरीद कर रहे हैं। दुकानें खुली हुई हैं। ग्राहक और व्यापारी फिर रहे हैं। कोई लेता है कोई देता है। किसी ने अपना सब कुछ बेच कर स्त्री की मुहब्बत खरीद की है, किसी ने पुत्र का मोह जमा कर रखा है।

किसी ने इस मनुष्य-जन्म की पूँजी को बेचकर दौलत को खरीदा है और उसी में अपना दिल लगाये बैठा है। किसी ने इस कीमती जन्म के बदले विषय-विकार खरीद किए हैं और सारा जीवन उन्हीं को प्राप्त करने में व्यतीत कर दिया है।

यह सब व्यापारी हैं। जो वास्तव में नफ़ा प्राप्त करने के लिए इस बाज़ार में आये थे परन्तु उल्टा मूल भी गँवा कर जाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

करना तो था रास्ते को साफ़, मगर ये अनजान अपने ही रास्ते में कांटे बिछाते जा रहे हैं। इन ग़ाफ़िलों को यह ज्ञान नहीं कि सांसारिक वस्तुओं का प्यार रास्ते में किस कदर रुकावट पैदा करेगा और अन्त में कितना दुःखदाई साबित होगा।

मुबारिक हैं वे लोग जो इस संसार रूपी बाज़ार में आकर सच्चा सौदा खरीद ले जाते हैं और उस मालिक के चरणों में अपना तन-मन-धन न्यौछावर करके भक्ति और सच्चे प्रेम के वारिस बनते हैं।

प्राणी तू आइआ लाहा लैणि ||

लगा कितु कुफकड़े सभ मुकदी चली रैणि ॥

गुरुवाणी

ऊपर के कथन से यह तो मालूम हो गया होगा किकिसी भी चीज़ के साथ मुहब्बत का पैदा करना खुद हमारे • अपने ही आधीन है। भाई, बन्धु, कुटुम्ब परिवार, यार दोस्त वगैरह किसी की भी दिल व जान के साथ सेवा करने से उन में प्यार का पैदा हो जाना ज़रूरी है।

परन्तु अब हमको सच्चे प्रेम की ख़ाहिश है। हम उस सच्चे मालिक के चरणों में प्रीति पैदा करना चाहते हैं तो हमको क्या करना चाहिए? इस सवाल का हल अभी बाकी है।

लेकिन यह बात भी हमारे सामने कोई नई नहीं है और न ही कोई मुश्किल है, क्योंकि पहले आदतें बनी हुई हैं। सिर्फ उनका रुख तबदील करना है। यानि जिस तरीके से हमने दुनियावी मुहब्बत को हासिल किया था और जो असूल वहाँ इस्तेमाल किया गया था, वही असूल यहाँ भी काम देगा। प्रेम चाहे परमार्थी हो या संसारी, पैदायश का तरीका दोनों का एक ही है।

यह नुक्ता जिस की समझ में आ गया, उसके दिल में भक्ति का पैदा होना कठिन नहीं। गोया जिन चीज़ों के ज़रिये हमने दुनियावी प्यार को खरीद किया था, उन्हीं से अब परमार्थी प्रेम भी हाथ आयेगा।

जैसा कि कुटुम्ब-परिवार के ऊपर कुरबानी करने से उसके बदले हमको उनका मोह हासिल हुआ था, उसी तरह अब उस सच्चे मालिक के चरणों में न्यौछावर होने से हमको सच्चा प्रेम प्राप्त होगा। मालिक चूँकि खुद आज़ाद, , बन्धनरहित और नित्य मुक्तस्वरूप है, इसलिए उसके ऊपर तन-मन

धन न्यौछावर करने से ऐसा प्रेम हासिल होगा, जो हमको भी माया के बन्धनों से आज़ाद करके मुक्त कर देगा।

क्योंकि यह कानून कुदरती है कि इन्सान जिस किस्म के कर्म करता है, उन सब का अक्स उसके मन पर पड़ता है। इसलिए ज्यों ज्यों हमारे तन का हिस्सा, मन का हिस्सा और धन का हिस्सा परमार्थ में खर्च होता जायेगा, हमारे ख़्यालात परमार्थी होते जावेंगे और सुरत साफ़ होकर खुद बखुद अन्तर्मुख होने लगेगी। दिल में नित्य नई नई उमंगें पैदा होने लगेंगी, जो हमारे कदम को तेज़ी के साथ आगे की तरफ उठाती और बढ़ाती हुई चलेंगी।

इस का नाम ‘भक्ति’ है। यही भक्ति के हासिल करने का अत्यन्त सरल ज़रिया है। यही फल है और यही फल की प्राप्ति का साधन है। यही मंज़िले मकसूद है और यही वहां तक पहुँचने के लिए खूबसूरत सीढ़ी है।

जिस के दिल में यह नुक्ता बैठ जाता है, उसकी भटकना दूर हो जाती है और वह शान्ति को हासिल कर लेता है। बन्धन और मोक्ष का सवाल उसके सामने हमेशा के लिए हल हो जाता है।

वह जान लेता है कि बन्धन क्या है और मोक्ष क्या है। उसके दिल से दिन-ब-दिन अंधकार दूर होकर रोशन ज़मीर आती जाती है।

जिस कदर वह रोशनी के नज़दीक होता जाता है, उस में पवित्रता आती जाती है और वह एक दिन मालिक के गहरे, एक रस, अनन्य और अविनाशी प्रेम में जा लीन होता है।

॥ दोहा ||

भक्ति बिगाड़ी कामिया, इन्द्रिय केरे स्वाद । हीरा खोया हाथ से, जन्म गँवायो बाद || कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय । भक्ति करे कोई सूरमा, जात वर्ण कुल खोय || जातवर्ण कुल खोय के, भक्ति करो चित्त लाय । कह कबीर सतगुरु मिलें, आवागमन मिटाय ॥

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