धर्मराज युधिष्ठिर

धर्मराज

युधिष्ठिर पांडु का ज्येष्ठ पुत्र था। धर्मराज द्वारा कुंती के आह्वान पर बुलाए जाने पर उनके अंश से ही यह पैदा हुआ था, इसलिए धर्म और न्याय इसके चरित्र में कूट-कूटकर भरा था। इसी के कारण इसको धर्मराज युधिष्ठिर पुकारा जाता था। वह कभी असत्य नहीं बोलता था, तभी शत्रु पक्ष के लोग भी उनकी बात पर पूरा विश्वास करते थे|

स्वार्थ के कारण किसी प्रकार अनुचित कार्य करना इनको नहीं सुहाता था।वह धीरबुद्धि था| कभी उतावला होकर कोई कार्य नहीं करता था| भीम, अर्जुन तथा अन्य भाइयों को कभी-कभी गुस्सा आता था तो वे मर्यादा की सीमाओं को भी लांघने को तैयार हो जाते थे, लेकिन युधिष्ठिर ने कभी सत्य के मार्ग को नहीं छोड़ा।

अगर उसके चरित्र को अच्छी तरह देखा जाए तो वह व्यक्ति क्षत्रिय अवश्य था, लेकिन एक योद्धा क्षत्रिय न होकर दार्शनिक क्षत्रिय था| उसकी चेतना केवल क्षत्रिय की सीमाओं के अंदर ही सीमित नहीं थी, बल्कि वह प्राय: जीवन के विराट् सत्यों पर चिंतन किया करता था|

छल-कपट उसे छू तक नहीं गया था| राजा होने पर भी कूटनीति से उसने कभी काम नहीं लिया| क्षमा सदा उसके व्यवहार में रही। बड़े-से-बड़े अपराधी को भी वह क्षमा कर देता था। गुरुदेव द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने प्रतिहिंसा की आग में जलकर द्रौपदी के पांचों पुत्रों को सोती अवस्था में मार दिया था|

इससे बड़ा अपराध और क्या हो सकता था। एक तो पुत्रों की हत्या, वंश नाश करने की कुचेष्टा और इस तरह अन्याय से, लेकिन युधिष्ठिर ने उस आततायी अश्वत्थामा को भी क्षमा कर दिया। उस समय अश्वत्थामा का वध करने के लिए तुले हुए पाण्डव उसके सामने कुछ नहीं बोल पाए थे|

उसकी आत्मिक शक्ति इतनी अधिक थी कि एक बार तो कितने भी क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति उसके सामने सिर झुका देता था।स्वभाव से वह सहनशील था। दूसरों की क्षुद्रता पर रोष करना उसे नहीं आता था। कौरवों ने क्या-क्या कुचक्र नहीं रचे। उन्होंने अपने ही भाई पांडवों को वारणावत भेज दिया और वहां लाक्षागृह में ठहराया।

वहां से उनको सुरंग लगाकर भागना पड़ा। और इस तरह दुर्योधन का वह षडयंत्र निष्फल चला गया, लेकिन युधिष्ठिर को इस पर भी क्रोध नहीं आया। उसने कभी भी अपने मुंह से यह बात नहीं कही कि दुर्योधन को नष्ट कर देना चाहिए।

सच देखा जाए तो वह पूरी तरह निष्काम कर्म योगी था। इस भौतिक संसार के सुख और दुख उसको अधिक विचलित नहीं करते थे। बच्चों के समान सरल उसकी प्रकृति थी। दूसरों के बनाए षडयंत्रों को वह नहीं जान पाता था|

इसका कारण यही था कि उसकी दृष्टि निरंतर जीवन की सुंदरता पर रहती थी। जीवन का पक्ष वह अच्छी तरह नहीं जानता था| भाई और मित्र पर पूरी तरह विश्वास करता था। एक सफल कूटनीतिज्ञ की तरह संदेह करना उसे नहीं आता था, तभी उसने दुर्योधन का जुआ खेलने का प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया|

राजसूय यज्ञ के पश्चात उसके वैभव को देखकर वृद्ध धृतराष्ट्र के मन में ईर्ष्या जाग उठी थी। उधर, दुर्योधन भी अंदर-ही-अंदर इस सारे वैभव से जल रहा था। उन्होंने ही जुए के रूप में युधिष्ठिर का सबकुछ छीनने का षडयंत्र रचा था|

उसी के लिए शकुनि तैयार किया गया था, जिसने प्रारंभ से अंत तक छल किया और अंत में युधिष्ठिर को हरा दिया। उस समय युधिष्ठिर धृतराष्ट्र और दुर्योधन के मन के भाव नहीं जान पाया था| उसकी तो उनके प्रति पहले जैसी ही श्रद्धा थी|

जुए में वह सबकुछ हार गया। यहां तक कि अपनी प्रिय पत्नी द्रौपदी और अपने प्यारे भाइयों को भी उसने दांव पर लगा दिया। उनको भी वह हार गया। उसकी सरलता के कारण ही उसकी यह पराजय हुई थी।

उसके बाद जब द्रौपदी का भरी सभा में अपमान किया गया तो वह कुछ भी नहीं बोला। इसका कारण उसकी न्याय प्रवृत्ति थी| द्रौपदी उसके दांव पर लगाने के कारण कौरवों की दासी हो गई थी, इसलिए दासी के साथ वे किसी प्रकार का व्यवहार कर सकते थे।

यही उस समय समाज की मर्यादा थी। भला इसके विरुद्ध युधिष्ठिर कैसे जाता| इससे यह स्पष्ट होता है कि सत्य और मर्यादा के पीछे वह धर्मात्मा अपने परिजनों को कितने भी कष्ट में देख सकता था।

बारह वर्ष तक वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास का दुख उसकी इस भूल के कारण सभी को सहना पड़ा था। लेकिन फिर भी उनके मन में इसके प्रति खेद नहीं था, बल्कि एह प्रकार का संतोष और सुख था कि वह अपने धर्म का पालन कर रहा है और उसने वनवास और अज्ञातवास की वह अवधि पूरी की।

उस बीच कभी यह विचार उसके मन में नहीं आया कि कौरवों ने यह कुचक्र रचकर ही हमें वनवास दिया है। फिर इसको स्वीकार करके क्यों कष्ट भोगा जाए? वह सत्यवादी था। एक बार वचन देकर लौटना तो जानता ही नहीं था|

वनवास के समय अन्य भाई कभी-कभी विक्षुब्ध हो उठते थे और कहते थे कि कौरवों के इस अन्याय को स्वीकार करना भी कौन-सा धर्म है? उधर, द्रौपदी भी निरंतर कौरवों के इस कुचक्र का बदला लेने के लिए युधिष्ठिर को उभारा करती, लेकिन वह धीर बुद्धि कभी भावा वेश में आकर अनुचित पथ का अनुसरण नहीं करता था|

वह द्रौपदी को समझाया करता था कि मनुष्य का सबसे बड़ा सुख तो उसके जीवन का सत्य है। यदि वह उसने छोड़ दिया तो धन-धान्य तथा अन्य राजसी ऐश्वर्य उसकी आत्मा को कभी संतोष नहीं पहुंचा सकते। असंतोष और तृष्णा ही तो जीवन में दुख का हेतु हैं, इन्हीं को जीतना जीवन की सबसे बड़ी विजय है।

इस दृष्टि से युधिष्ठिर विज यी था। उसका चेहरा सदा प्रशांत भाव से देदीप्यमान रहता था। उसके इसी गुण के कारण ही सभी उसकी आज्ञा मानते थे|

उसने अपने चरित्र से पूरी तरह सिद्ध कर दिया था कि महात्मा ही इस संसार में पूज्य हैं, बाकी अन्य बड़े-से-बड़े सम्राट भी अपने कार्यों के द्वारा घृणा के पात्र हो जाते हैं। महात्मा ही अमर होता है, अन्य सभी को काल निगल जाता है और शीघ्र ही उनकी स्मृति मिट जाती है।

देखा जाए तो महाभारत का प्रमुख पात्र युधिष्ठिर ही है। जो अपने युग की सीमाओं के भीतर रहकर भी जीवन के विराट् सत्यों की ओर पूरी तरह सजग रहता है। अन्य कोई पात्र इस गौरव को नहीं पहुंचता। वही था जिसने कुत्ते को भी स्वर्ग का अधिकारी बनवाया था|

समाजगत भेद-भावों को वह छोटी परिधि के सत्य मानता था, तभी तो उसने उस स्वर्ग में जाने से इनकार कर दिया था, जहां उसकी-सी ही आत्मा रखने वाले कुत्ते को प्रविष्ट करने का

अधिकार न हो| क्या युधिष्ठिर के अलावा और व्यक्ति उस समय के समाज में यह बात कह सकता था? वह जीवन के स्वार्थों के प्रति प्रायः उदासीन रहा करता था। महाभारत युद्ध के समय कभी उसने अपनी विजय के लिए उत्सुकता नहीं दिखाई।

यहां तक कि जब कृष्ण ने द्रोणाचार्य के वध के लिए उससे यह कहलवाना चाहा कि अश्वत्थामा मर गया तो उसने यह झूठ बोलने से साफ इनकार कर दिया और फिर कृष्ण के बहुत कहने पर भी स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि, ‘द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा मर गया, बल्कि यह पता नहीं कि अश्वत्थामा नाम का मनुष्य मरा या उस नाम का हाथी, इस तरह कहकर उसने अपने राज्य धर्म का पालन किया, लेकिन फिर भी वह झूठ तो था ही, क्योंकि पूरी तरह जानते हुए भी कि अश्वत्थामा हाथी ही मरा है, उसने यह संशयात्मक वाक्य कहा था,

इसलिए कुछ क्षणों तक उसको नरक की यात्रा करनी पड़ी। बस इसी स्थल पर हम उसकी थोड़ी-सी शिथिलता पाते हैं, नहीं तो वह अपने जीवन के आदर्शों पर एक चट्टान की तरह दृढ़ था|

क्षमा उसके का आदर्श था| बिना शत्रु मित्र का विचार करके वह सभी को क्षमा कर दिया करता था| जिस समय गंधर्वराज चित्रसेन दुर्योधन आदि को बांध लाया था, तब युधिष्ठिर ने प्रार्थना करके उनको छुड़वा दिया था|

गंधर्वराज ने बार-बार कहा था कि उसने दुष्ट दुर्योधन को पांडवों के हित के लिए ही बंदी बनाया है, लेकिन क्षमाशील और उदार प्रवृत्ति वाला युधिष्ठिर वनवास का यह कष्ट पाते हुए भी दुर्योधन के प्रति भ्रातृत्व का भाव रखता था और उसने चित्रसेन से प्रार्थना करके दुर्योधन को मुक्त करवा दिया|

इसी प्रकार जब एक चक्रा नगरी से पांडव आ रहे थे तो रास्ते में अंगारपूर्ण गंधर्वराज से अर्जुन की मुठभेड़ हो गई। युद्ध की तैयारी हो गई, लेकिन युधिष्ठिर ने ही अंगार पूर्ण को क्षमा कर दिया और अर्जुन को आज्ञा दी कि गंधर्वराज को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाए।

इस प्रकार युधिष्ठिर के कहने से ही वह झगड़ा थम गया। युधिष्ठिर को क्रोध प्राय: बहुत कम आता था| जिस समय पांडव राजा विराट के यहां रहकर अपने अज्ञातवास का समय काट रहे थे, उसी समय विराट के ऊपर दो आक्रमण हुए। पहले तो उनके गोधन को लेने के लिए सुशर्मा ने उनके ऊपर आक्रमण किया, दूसरी ओर दुष्ट कौरवों ने आकर आक्रमण कर दिया।

विराट तो सुशर्मा से लड़ने चले गए। कौरवों से युद्ध करने के लिए राजकुमार उत्तर बृहन्नला नामधारी अर्जुन को अपना सारथी बनाकर ले गया, लेकिन दुर्योधन की विशाल सेना देखकर उत्तर युद्ध से भागने लगा तो अर्जुन ने उसे रोककर स्वयं धनुष लेकर कौरवों से युद्ध किया और उनको पराजित कर दिया।

लेकिन नगर में लौटने पर यही घोषित किया कि राजकुमार उत्तर ने ही यह विजय प्राप्त की है। राजा विराट सभा में बैठे हुए अपने पुत्र की प्रशंसा कर रहे थे, उस समय कंक नामधारी युधिष्ठिर ने कहा, ‘महाराज !

दुर्योधन आदि योद्धाओं को जीतना उत्तर के लिए कभी संभव नहीं है। उत्तर व्यर्थ अपनी प्रशंसा करते हैं। बृहन्नला ही उनको पराजित कर सकता है।*यह सुनकर विराट ने अपने हाथ के पांसों को खींचकर युधिष्ठिर के मुंह पर मारा, जिससे उसके मुंह से खून बहने लगा|

लेकिन उस समय भी वह धीरबुद्धि क्रुद्ध नहीं हुआ। उसके स्थान पर यदि और कोई होता तो राजा विराट के इस व्यवहार को नहीं सह पाता, लेकिन युधिष्ठिर कुछ नहीं बोला। उसकी इस महानता के कारण ही बाद में यह पता लगने पर ही कि अन्य नामधारी सभी पांडव भी यहां ठहरे हुए हैं, राजा विराट को अपने व्यवहार पर बड़ा दुख हुआ और उसने युधिष्ठिर से अपने धृष्टता पूर्ण व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। वह बड़ा ही विनयशील था। बड़ों का सदा उचित सम्मान करता था|

महाभारत युद्ध छिड़ने के पहले वह रथ से उतरकर पैदल ही भीष्म आदि गुरुजनों की वंदना करने गया था। उस समय भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और मद्रराज शल्य ने सच्चे हृदय से उसको आशीर्वाद दिया था। उसके इस शील-स्वभाव के कारण शत्रु पक्ष के महारथी सदा उसकी प्रशंसा करते रहे।

युधिष्ठिर धर्म और समाज नीति को अच्छी तरह जानता था और सदा इस विषय पर चिंतन किया करता था। वनवास के समय एक बार भीमसेन एक विशाल अजगर के चंगुल में फंस गया। जब काफी देर तक वह नहीं लौटा तो युधिष्ठिर उसको खोजने निकला।

वहां अजगर के चंगुल में अपने भाई को पाकर उसने अजगर से भीम को छोड़ देने की प्रार्थना की। अजगर ने कहा कि यदि तुम मेरे प्रश्नों का ठीक-ठीक उत्तर दोगे तो मैं तुम्हारे भाई को छोड़ दूंगा| युधिष्ठिर ने यह शर्त स्वीकार कर ली। इसके पश्चात अजगर ने धर्म और समाजनीति पर प्रश्न पूछना शुरू किया|

युधिष्ठिर ने प्रत्येक प्रश्न का समुचित उत्तर दिया। इससे प्रसन्न होकर अजगर से भीमसेन को छोड़ दिया।वनवास के समय एक बार मार्कण्डेय मुनि से भी युधिष्ठिर की भेंट हुई थी और उन्होंने अनेक बहुमूल्य उपदेश उसको दिए थे|

महाभारत युद्ध में अपने पक्ष की विजय हो जाने के पश्चात भी युधिष्ठिर को कोई हर्ष नहीं हुआ था। स्वजनों के इस महाविनाश के कारण उसका हृदय अत्यंत दुखी हुआ था और तभी उसने समाज की मर्यादा के विरुद्ध यह सलूक किया था कि क्षत्रिय का ऐसा क्रूर कर्म क्यों है? क्या धर्म की यह मर्यादा शाश्वत है?

और तभी उसकी आत्मा बोल उठी – धर्म की गति विचित्र है।सभी ने पांडवों की विजय पर खुशी मनाई थी, लेकिन वह बार-बार पूछता रहा था कि आखिर इस विजय का तात्पर्य क्या है? यह विजय किसकी है? क्या यह मानव के सत्य की विजय है?

तो फिर इसमें हृदय को इतनी पीड़ा और दुख क्यों है? इस प्रकार के विचार निरंतर उसके मस्तिष्क में उठते रहे और दिन-प्रतिदिन अपने स्वजनों की याद करके वह अधीर रहने लगा। कुरुक्षेत्र में बहा हुआ भाइयों और पूज्यवरों का रक्त उसकी दृष्टि के सामने आने लगा। जो व्याकुलता अर्जुन को युद्ध के आरंभ में हुई थी, वह उसको अंत तक रही और अंत में तो काफी बढ़ गई थी।

तभी श्रीकृष्ण उसे भीष्म पिता मह के पास ले गए थे। वे कृष्ण, जिन्होंने गीता का उपदेश देकर अर्जुन को शांत किया था, युधिष्ठिर को नहीं समझा पाए अपने धर्म युग का उपदेश वे उसको नहीं दे पाए। उन्होंने जाकर शर-शय्या पर पड़े भीष्म पितामह से कहा,”जाति की हत्या करने के पाप से दुखी युधिष्ठिर बहुत ही व्याकुल हो रहे हैं। धर्मयुक्त उपदेश देकर उनके शोक को दूर करिए|

इसीलिए मैं इनको आपके पास लाया हूं।”पितामह ने राजधर्म, आप धर्म और मोक्ष के उपदेश युधिष्ठिर को दिए और अनेक तरह से उसको समझाया, लेकिन फिर भी उसके हृदय का संताप पूरी तरह नहीं मिटा| तभी तो जिस समय अंत में स्वर्गीय स्वजनों को पानी देने के लिए खड़े युधिष्ठिर के सामने कुंती ने यह भेद खोला था कि कर्ण उसी का अग्रज है तो उसने क्रुद्ध होकर अपनी माता को ही शाप दे दिया था कि स्त्री के पेट में आज से कभी कोई बात अधिक देर तक नहीं टिकेगी|

यदि उसको पहले ही यह पता होता तो वह कर्ण को अग्रज मानकर उसकी आज्ञा में चलता और इस महाविनाश के पाप का बोध उसके सिर पर नहीं चढ़ता। अंत तक उसके हृदय को यही बात कष्ट देती रही कि सबसे बड़ा भाई होने नाते वही उस महाभारत के भीषण संग्राम के लिए उत्तरदायी है।

युद्ध समाप्त होते ही द्रौपदी के पांचों पुत्र मारे गए। उधर, अभिमन्यु पहले ही मारा जा चुका था। फिर कृष्ण के कुल में भी फूट पड़ गई थी और वहां भी सर्वनाश हो गया था। स्वयं श्रीकृष्ण को उपेक्षित की भांति अपने प्राण त्यागने पड़े थे| उस समय उनका दाह-संस्कार करने तक के लिए उनका कोई स्वजन उपस्थित नहीं था।

इन सभी कारणों से युधिष्ठिर जीवन के प्रति उदासीन हो उठा। यद्यपि महाभारत के बाद कुछ वर्ष तक वह राज्य करता रहा, लेकिन कभी भी उसका चित्त प्रसन्न नहीं रहा। अनेक प्रकार के भयानक प्रश्न उसके मस्तिष्क में उठते थे और उसकी चेतना को झकझोरकर रख देते थे। अंत में वह जीवन से इतना ऊब गया था कि इसमें किसी प्रकार का सौंदर्य और सुख उसे दिखता ही नहीं था।

जीवित रहने का लगाव उसके हृदय से मिट गया था, तभी अपने पोते परीक्षित को राज्य देकर वह अपनी पत्नी द्रौपदी और चारों भाइयों के साथ हिमालय की ओर चल दिया और वहीं उसके भाई और द्रौपदी बर्फ में गलकर मर गए थे और वह सदेह स्वर्ग गया। इंद्र और स्वयं धर्मराज उसको लेने आए थे। यह उसके पुण्य का प्रभाव ही था |

पहले-पहले उसे नरक में होकर गुजरना पड़ा था। वहां सहसा उसे अपने भाइयों तथा द्रौपदी की चीत्कार सुनाई दी| इससे वह व्यथित हो उठा और इंद्र से वह पूछने लगा, “क्या कारण है कि मेरे भाइयों को और द्रौपदी को नरक की दारुण यातना भोगनी पड़ रही है?”इंद्र ने कहा, “हे धर्मराज ! मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है।

तुम्हारे भाइयों और द्रौपदी के थोड़े पाप कर्म हैं, उन्हीं के कारण इनको ये यातनाएं सहनी पड़ रही हैं, लेकिन शीघ्र ही इनकी मुक्ति होगी और फिर सदा ये पुण्यों के फलस्वरूप स्वर्ग का आनंद भोगेंगे।”इसके पश्चात युधिष्ठिर स्वर्ग में पहुंचा तो वहां उसको दुर्योधन, कर्ण आदि सभी मिले। उन्हें देखकर उसको भी विस्मय होने लगा और फिर धर्मराज के न्याय पर क्रोध भी आने लगा, लेकिन इंद्र ने कहा, ‘युधिष्ठिर !

इन्होंने युद्ध करके वीरगति प्राप्त की है। इसी का पुण्य फल ये स्वर्ग में भोग रहे हैं, लेकिन इसके समाप्त हो जाने के पश्चात अपने अनेक पापों का परिणाम ये नरक में भोगेंगे। शीग्र ही इनका पतन होगा।”कुछ ही देर के पश्चात युधिष्ठिर ने देखा कि कौरवों का पतन होने लगा|

वे चीत्कार करते हुए स्वर्ग से नरक की आग में गिरने लगे और नरक में से अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, द्रौपदी के साथ स्वर्ग में आ गए। उनसे मिलकर युधिष्ठिर को अत्यधिक प्रसन्नता हुई। इसके पश्चात वे सभी अपने पुण्यों का फल भोगने लगे।युधिष्ठिर के चरित्र को पूरी तरह देखने से यह मालूम होता है कि वह सद्गुणों की खान था।

वह एक विचारक था, जो निरपेक्ष दृष्टि से मानवतागत मूल्यों पर विचार किया करता था और फिर अपने हृदय की बात को कहने का साहस रखता था| कभी स्वार्थ के लिए सत्य पर परदा डालने की उसने चेष्टा नहीं की। अपना दयालु स्वभाव होते हुए भी वह रणभीरू कभी नहीं था| जब कभी युद्ध स्थल में उतरता था तो पूर्ण साहस के साथ युद्ध करता|

मद्रराज शल्य उसी के हाथ से मारा गया था| कर्ण से भी उसने युद्ध किया था, लेकिन घायल होने के कारण आगे उससे युद्ध नहीं कर पाया था। अर्जुन ने कर्ण से टक्कर ली थी और जब अर्जुन पूरे दिन लड़कर भी कर्ण को परास्त नहीं कर पाया था तो युधिष्ठिर ने उसको बुरी तरह फटकारा था|

उसने उसके गाण्डीव धनुष तक को ललकारा था| इस पर अर्जुन ने क्रुद्ध होकर अपने अग्रज का वध करने की ठान ली थी, लेकिन कृष्ण ने बीच-बचाव कर दिया। फिर अर्जुन ने युधिष्ठिर से अपनी धृष्टता के लिए क्षमा मांगी थी।

युधिष्ठिर के जीवन में यही एक घटना है, जहां उसने अपना धैर्य तोड़ दिया था, नहीं तो सदा धैर्य रखा। आशा ही उसके जीवन को सुखमय बनाती रहती थी। वह आशावादी था|

बड़ी से बड़ी आपत्ति आने पर भी वह घबराता नहीं था और उनके बीच भी भविष्य में सुखी जीवन की आशा करता था।मार-काट और युद्ध से वह सदा घृणा करता था, तभी उसने क्षत्रिय के इस क्रूर कर्म की कुछ आलोचना की थी। महाभारत के युद्ध को टालने की उसने हर बार कोशिश की, लेकिन दुर्योधन की दुष्टता के आगे उसकी कोशिश बेकार हो गई।

उसने वनवास तक स्वीकार कर लिया और फिर कौरवों से अपना हिस्सा प्राप्त करने तक की आशा की, लेकिन वह भी उसे नहीं मिला। तब अंत में विवश होकर उसे युद्ध करना पड़ा। स्वाभिमानी वह पूरा था, वह कभी दबना नहीं जानता था। दबता तो वह सत्य से था| व्यक्ति की सत्ता का उसके सामने अधिक मूल्य नहीं था|

द्रौपदी के अपमानित होने के समय वह सिर्फ मर्यादा और अपने दिए हुए वचन के कारण ही चुप बैठा रहा था, किसी प्रकार के भय के कारण नहीं। माता का भी वह अनन्य सेवक था। पुत्रहीन गांधारी की उसने ऐसी सेवा की थी कि स्वयं दुर्योधन भी अपने जीवन काल में ऐसी सेवा नहीं कर पाया।

धृतराष्ट्र भी उसकी सेवा से प्रसन्न हो गए थे| उसने अपने जीवन के आदर्शों पर चलकर ही तो गांधारी और धृतराष्ट्र का असीम प्रेम प्राप्त किया था| शत्रु वर्ग से भी ऐसा प्रेम प्राप्त कर लेना महापुरुषों के लिए ही संभव है। इस दृष्टि से देखा जाए तो वह रोग और द्वेष से परे था| गीता के अनुसार देखा जाए तो वह निष्फल कर्मयोगी था| उसकी समान दृष्टि थी। भेदभाव करना वह नहीं जानता था|

राजनीति के मामलों में इतना नादान था कि कभी-कभी तो बिना सोचे-समझे ही बात मुंह से निकाल जाता था | इसी प्रकार जब कौरव पक्ष का अंतिम योद्धा दुर्योधन बच रहा और वह जाकर द्वैपायन सरोवर में जा छिपा तो सभी पाण्डव उसे खोजते हुए वहीं जा पहुंचे। उस समय सभी ने दुर्योधन को ललकारा, जिससे आवेश में आकर वह बाहर निकल आया। उस समय दुर्योधन ने उससे कहा, ‘युधिष्ठिर ! अब सबकुछ विनष्ट हो चुका है।

मेरी ओर से सभी पराक्रमी योद्धा मारे जा चुके हैं, अब मुझे इस राज्य की आकांक्षा नहीं है। इसे तुम्हीं लेइस पर युधिष्ठिर बोला, ‘दुर्योधन ! यदि तुम इसी डर से इस सरोवर में छिप गए हो कि अकेले पर हम सभी आक्रमण करेंगे, तो सुनो, हम पांचों भाइयों में से जिस एक से तुम युद्ध करना चाहो, उसी से युद्ध कर लो।

जो जीत जाएगा, वही राज्य का अधिकारी होगा।”*उसकी यह बात सुनकर सभी एक साथ सकते में रह गए। कृष्ण तो सोचने लगे कि युधिष्ठिर ने सारा बना-बनाया खेल ही बिगाड़ दिया, क्योंकि उस समय यदि दुर्योधन नकुल, सहदेव या उस युधिष्ठिर से ही गदा युद्ध करने की इच्छा प्रकट करता तो उनमें से कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता था।

यहां तक कि यदि भीमसेन भी कृष्ण का इशारा न समझकर वैसे ही लड़ता रहता तो दुर्योधन उसे धराशायी कर देता। कृष्ण ही वह सफल राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सदा पांडवों की भूलों को सुधारा और उनको ठीक सलाह देकर परिस्थित को अपने वश में किया। महाभारत में पांडवों की विजय का सारा श्रेय श्रीकृष्ण को ही है। यदि वे नहीं होते तो पांडव कभी भी विजयी नहीं होते।युधिष्ठिर तो पल-पल में संशय में पड़ जाता था।

एक तरफ तो महाभारत का युद्ध हो रहा था और दूसरी ओर उसकी आत्मा में एक प्रकार का भीषण संघर्ष चल रहा था। इसी निरंतर चलते संघर्ष के कारण वह कभी एक क्षत्रिय की तरह क्रूर नहीं हुआ। उसने कभी अपने आपको अन्य क्षत्रिय धर्म की सीमाओं में नहीं मिटाया, बल्कि वह तो सत्य को खोजने वाला दार्शनिक था।

दुर्योधन के प्रति एक बार भीम इतना क्रूर हो गया था कि उसकी जांघ तोड़ने के बाद वह उसके सिर को लात मारने के लिए भी उद्यत हो गया, लेकिन युधिष्ठिर ने भीम को रोक लिया। उसके हृदय में दुर्योधन के प्रति किसी प्रकार की घृणा नहीं थी| घृणा उसे मनुष्य से नहीं थी, बल्कि मनुष्य के विकारों से थी|

क्षत्रिय होकर भी जीवन की समस्याओं के ऊपर निरंतर चिंतन करने वाला इतिहास में यह पहला ही दार्शनिक मिलता है जिसकी चेतना ने मर्यादा की संकीर्णता को स्वीकार नहीं किया था। अंत में महाभारत के इस महान द्रष्टा का जीवन संसार को यह पाठ देकर समाप्त हो गया कि धर्म की गति विचित्र है। मनुष्य जिन मर्यादाओं को सत्य और शाश्वत मानता है, वे शाश्वत नहीं हैं। चेतना का प्रवाह पहले रहता है और उन मूल्यों में निरंतर परिवर्तन आता रहता है।

महाभारत का अंत एक तीव्र विषमता और दुख में हुआ, उसी प्रकार इसका जीवन भी दुख को इस संसार में सत्य घोषित करके समाप्त हुआ। वह प्रमाणित कर गया कि मनुष्य के सुख और वैभव से भी ऊंचा मनुष्य के जीवन का सत्य है और उसी के साक्षात्कार से जीवन में सच्चा संतोष मिलता है, उसी से परलोक में स्वर्ग का सुख मिलता है। अंत में यही कहना उचित होगा कि युधिष्ठिर महाभारत का सबसे महान और उदात्त पात्र है, जिसके चरित्र के द्वारा ही महाभारत का दार्शनिक पक्ष स्पष्ट होता है।

Leave a Comment