गणतंत्र दिवस
31 दिसम्बर, 1928 को श्री जवाहर लाल नेहरु ने ब्रिटिश शासनों को चुनौती दी थी। अगर ब्रिटिश सरकार हमें औपनिवेशक स्वराज देना चाहे तो 31 दिसम्बर, 1929 तक दे दें। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने भारतियों की इस इच्छा की पूरी तरह से अवहेलना की थी। सन् 1930 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ था और श्री जवाहर लाल नेहरु जी इसके अध्यक्ष बने थे।
रावी नदी के तट पर बहुत विशाल पंडाल बनाया गया था। 26 जनवरी, 1930 को रात्रि के समय उस अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरु जी ने कहा था कि अब हमारी मांग पूर्ण स्वतंत्रता है और हम स्वतंत्र हो कर ही रहेंगे। उस दिन भारत के हर गाँव और नगर में स्वतंत्रता की शपथ ली गयी थी। भारत में जगह-जगह सभाएं हुईं, जुलुस निकाले गये, करोड़ों भारतियों के मुख से एक साथ गर्जना सुनना लक्ष्य है- पूर्ण स्वाधीनता ।
कि हमारा जब तक हम पूर्ण स्वाधीन नहीं हो जायेगें तब तक लगातार बलीदान देते रहेंगे। भारत की इस पवित्र भूमि पर हर साल पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं।किन्तु कुछ पर्वों का एक विशेष महत्व और संबंध पूरे राष्ट्र और उसमें रहने वाले देश वासियों से होता है जिन्हे राष्ट्रिय पर्व कहते हैं। गणतंत्र दिवस भी इन्हीं राष्ट्रिय पर्व में से एक होता है।
गणतंत्र का अर्थ :
गणतंत्र को लोकतंत्र, जनतंत्र व प्रजातंत्र भी कहते हैं जिसका अर्थ है प्रजा का राज्य या प्रजा का शासन ।
जिस दिन देश का संविधान लागू हुआ था उसी दिन को गणतंत्र दिवस कहते हैं। हमारे देश में संविधान 26 जनवरी, 1950 से लागू हुआ था इसीलिए इस तारीख को गणतंत्र दिवस कहते हैं।
हमारा देश 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ था लेकिन उससे पहले हमारे देश पर राजाओं, सम्राटों और ब्रिटिशों की सरकार का शासन था। स्वतंत्रता के बाद हमारे देश के विद्वान् नेताओं ने देश में प्रजातंत्र शासन पद्धति लागू करने के लिए संविधान बनाया जिसको बनाने में चार साल लगे थे।
सन् 1946 से संविधान बनाना शुरू हो गया था और दिसम्बर सन् 1949 में बनकर तैयार हो गया था। इस संविधान को 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया था। तभी से हर साल 26 जनवरी को हमारे देश में गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
ऐतिहासिकता
हमारे लिए 26 जनवरी का बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्व होता है। सन् 1950 से पहले भी इस दिन को सन् 1930 में हर साल स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया जाता था।
दिसम्बर 1929 को कांग्रेस ने रावी नदी के किनारे लाहौर अधिवेशन के दौरान पूर्ण स्वराज्य की घोषणा हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी। हमारे उन नेताओं ने बसंत पंचमी के अवसर 26 जनवरी, 1930 पर स्वाधीनता दिवस मनाने का फैसला लिया।
तभी से हर साल 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस मनाया जाता था लेकिन 15 अगस्त, 1947 को देश के स्वतंत्र होने की वजह से 15 अगस्त को ही स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने लगे थे परन्तु 26 जनवरी की गरिमा को बनाये रखने के लिए 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू करने का निश्चय किया।
तभी से हम 26 जनवरी को हर साल अपने संविधान का जन्म दिन या अपने गणतंत्र की वर्षगांठ मनाते हैं। 26 जनवरी राष्ट्रिय पर्वों में एक महापर्व होती है क्योंकि इसी दिन संघर्ष के बाद राष्ट्र को सर्वप्रभुत्तासंपन्न गणतंत्रात्मक गणराज्य का स्वरूप प्रदान करने का श्रेय इसी तारीख को जाता है।
भारतीय गणतंत्रात्मक लोकराज्य का स्व-निर्मित संविधान इसी पुन्य तारीख को कार्य करने में परिणत हुआ था। 26 जनवरी के दिन ही भारत में जनरल गवर्नर के पद की समाप्ति हुई थी और शासन का प्रतीक राष्ट्रपति बना था।
राष्ट्रिय स्तर पर मनाने की परम्परा :
गणतंत्र दिवस का समारोह हर साल 26 जनवरी को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रिय स्तर पर दिल्ली में बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस समारोह की तैयारियां भारत सरकार कई दिन पहले से ही करना शुरू कर देती है। गणतंत्र दिवस से पहली संध्या को देश का राष्ट्रपति देश के नाम संदेश देता है। जिसका प्रसारण संचार के माध्यमों से किया जाता है।
गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम सुबह की शहीद ज्योति के अभिवादन से शुरू होता है इसे देश के प्रधानमंत्री इण्डिया गेट पर प्रज्ज्वलित करके शहीद ज्योति का अभिनंदन करके देश के शहीदों को श्रद्धांजली अर्पित करते हैं। उसके बाद विजय चौक पर निर्मित सलामी मंच पर राष्ट्रपति जी की सवारी शाही सम्मान के साथ पहुंचती है।
उस स्थान पर प्रधानमंत्री और गणमान्य जन उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। उसके बाद गणतंत्र दिवस की परेड का शुभारंभ किया जाता है जो बहुत ही दर्शनीय होती है। सेना के तीनों अंगों के जवानों की कई विभिन्न टुकडियां अपने-अपने बैंडों की आवाज के साथ पद संचालन करते हुए तथा राष्ट्रपति को अभिवादन करते हुए परेड करते हैं।
इसके बाद युद्ध में प्रयुक्त होने वाले हथियारों की ट्रालियां आती हैं जो सेना में प्रयुक्त विविध रक्षा साधनों से सुसज्जित होती हैं।
इसके बाद भारत की विभिन्न सांस्कृतिक झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं। देश के छात्र-छात्राओं की टुकडियां अपने विवध कौशल को दिखाते हुए आगे बढती हैं। आखिर में वायु सेना ने लड़ाकू विमान भी अपना अनुपम व विचित्र कौशल दिखाते हुए आकाश में विलीन हो जाते हैं। उक्त सारी सवारियां विजय चौक से होकर लाल किले तक पहुंचती हैं।
सरकारी प्रयत्न :
जब सन् 1929 को लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था तो उसमें श्री जवाहर लाल नेहरु जी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। जवाहर लाल नेहरु जी ने यह प्रस्ताव पारित किया था कि 26 जनवरी के दिन हर भारतीय राष्ट्रिय पताका के नीचे खड़ा होकर प्रतिज्ञा करे कि हम भारत के लिए पूरी स्वाधीनता की मांग करेंगे और उसके लिए अंतिम दम तक संघर्ष करेंगे।
तभी से हर साल 26 जनवरी मनाने की परंपरा चलनी शुरू हुई थी। जब स्वाधीनता प्राप्त हो गई तो उसके बाद भारतीय नेताओं ने 26 जनवरी को नवीन संविधान को भारत पर लागु करना उचित समझा था। 26 जनवरी, 1950 को सुबह अंतिम गवर्नर जनरल सी० राज गोपालाचार्य ने राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद को कार्य सौंपा था।
स्वतंत्रता पूर्व स्थिति :
ब्रिटिश शासन काल में 26 जनवरी, 1930 के बाद से लेकर हर साल 26 जनवरी को एक राष्ट्रिय पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। 26 जनवरी के दिन जगह-जगह बैठकें करके रावी नदी के तट पर लाहौर में पूर्ण स्वाधीनता की प्रतिज्ञा को दोहराया जाता था।
एक तरफ भारतियों ने पूर्ण स्वाधीनता की प्रतिज्ञा की थी तो दूसरी तरफ अंग्रेजों ने भारत के दमन को और अधिक तेजी से करना शुरू कर दिया था।
जो लोग पूर्ण स्वाधीनता के प्रेमी थे उनके सिरों को लाठियों से फोडा जाने लगा। बहुत सी जगहों पर गोलियों की बौछारें भी की गयी और देशप्रेमियों को मारा गया। बहुत से नेताओं को भी जेलों में बंद कर दिया गया लेकिन भारतीय अपने रास्ते पर अडिग बनकर खड़े रहे। भयानक-से-भयानक यातनाएं भी उन्हें उनके रास्ते से हटा नहीं सकीं थीं। उसी देशभक्ति के फलस्वरूप आज हमारा भारत स्वतंत्र है। हमारी भाषा, हमारी संस्कृति, हमारा धर्म और हमारी सभ्यता आज पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं।
भारत का गणतंत्र राज्य घोषित होना :
सन् 1950 में जब भारतीय संविधान बनकर तैयार हुआ था उस समय यह विचार किया गया कि किस तारीख को इसे भारतवर्ष में लागू किया जाये। बहुत विचार-विमर्श करने के बाद 26 जनवरी को ही इसके लिए उचित तिथि समझा गया। अत: 26 जनवरी, 1950 को भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणतंत्र घोषित किया गया था।
देश का शासन पूरी तरह से ही भारतवासियों के हाथों में आ गया था। देश का हर नागरिक देश के प्रति अपने कर्तव्य का अनुभव करने लगा था। देश की उन्नति और मान-मर्यादा को हर नागरिक अपनी मान-मर्यादा और उन्नति समझने लगा था। भारत के इतिहास में भी 26 जनवरी का दिन एक बहुत महत्वपूर्ण दिन है।
राष्ट्र का पावन पर्व :
26 जनवरी को राष्ट्र का यह पर्व बहुत ही पवित्र मानते है। 26 जनवरी के दिन अनेक बलिदानों की पावन स्मृतियाँ प्रस्तुत की जाती है। बहुत से वीरों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों को हँसते-हँसते कुर्बान कर दिया था।
माताओं ने अपनी गोद की शोभा, कितनी पत्नियों ने अपनी मांग का सिंदूर और कितनी ही बहनों ने अपने रक्षा-बंधन के त्यौहार को हंसते-हंसते स्वतंत्रता संग्राम को भेंट कर कुर्बान कर दिया था। आज के दिन हम उन सभी शहीदों को याद करते हैं जिन्होंने स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए स्वतंत्रता की अग्नि में अपने खून की आहूति आर्पित की थी। आज के दिन उन सभी शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
दिल्ली में आयोजित समारोह :
आधुनिक समय में राष्ट्रिय पर्वों को राष्ट्रिय नहीं बल्कि सरकारी तरीके से सरकार द्वारा ही मनाते है। ये समारोह इस तरीके न तो साधारण जनता को इससे प्रेरणा मिलती है और न ही उनके अंदर आंतरिक उल्लास और स्फूर्ति जागृत होती है जो राष्ट्र के लिए होनी चाहिए । सरकार 26 जनवरी को लोकप्रिय उत्सव बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।
दिल्ली में 26 जनवरी के दिन विशाल और असधारण समारोह आयोजित होता है। हमें इस समारोह को तरह आयोजित करना चाहिए ताकि यह सभी का सुरुचिपूर्ण और आकर्षण का केंद्र बन जाए। करनी चाहिए कि यह उत्सव नगरों तक ही सीमित न रहकर ग्रामीण जनता के लिए भी सुरुचिपूर्ण और आकर्षण होना चाहिए।
यह समारोह देश के प्रत्येक कोने में बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है लेकिन भारत की राजधानी दिल्ली की शोभा ही अलग होती है।
मुख्य समारोह सलामी में पुरस्कार वितरण आदि तो इंडिया गेट पर ही होता है। 31 तोपों को दागा जाता है। सैनिक द्वारा वधिक यंत्रों को बजाया जाता है। इस अवसर पर हमारे देश के राष्ट्रपति जी अपने भाषण में राष्ट्र को कलयाणकारी और प्रेरणादायक संदेश देते हैं।विभिन्न प्रांतो की झांकिया प्रस्तुत की जाती है।
शोभा यात्रा नई दिल्ली की सभी सड़कों पर घूमती है।
इसके साथ-साथ तीनों सेनाएं, घुड़सवार, टैंक, मशीनगने, टैंक नाशक तोपें,विध्वंसक तथा विमान भेदी यंत्र रहते हैं। बहुत से प्रान्तों के लोग नृत्य और शिल्प आदि का प्रदर्शन करते हैं। इस अवसर पर कई एतिहासिक महत्व की वस्तुएं भी उपस्थित की जाती हैं। छात्र-छात्राएं भी इसमें भाग लेती हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं।
गणतंत्र दिवस को पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में इस दिन की शोभा को देखने के लिए देश के भिन्न-भिन्न राज्यों से लोग आते हैं। बहुत से स्थानों पर खेल, तमाशे, सजावट, सभाएं, भाषण, रौशनी, कवि-गोष्ठियाँ, वाद-विवाद प्रतियोगिता जैसे अनेक प्रकार के खेल खेले जाते हैं।
जनता और सरकार दोनों के द्वारा ही इस मंगल पर्व को मनाया जाता है। सारे देश में प्रसन्नता और हर्ष की लहर दौड़ने लगती है। यह पर्व हमारे राष्ट्रिय गौरव और स्वाभिमान का प्रतीक होता है। आज के दिन बहुत सी झाँकियाँ निकाली जाती हैं जो अनेकता में एकता का प्रतिक होती हैं।
स्वदेश व विदेश में :
26 जनवरी को हर साल देश की प्रांतीय राजधानियों में राज्यपाल व मुख्यमंत्री ध्वजारोहण के साथ गणतंत्र दिवस का शुभारंभ करते है उसके बाद पूरे दिन विवध कार्यक्रम चलते रहते हैं। विद्यालयों व कॉलेजों में छात्र बड़े हर्षोल्लास के साथ इस त्यौहार को मनाते हैं।
शाम के समय सांस्कृतिक कार्यक्रम में नाटक, प्रहसन, कवि सम्मेलन आदि सम्पन्न होते हैं। विदेशों में भी गणतंत्र दिवस को बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हर देश में विद्यमान भारत के दूतावासों में यह पर्व प्रवासी भारतीय लोगों द्वारा बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। संबंधित देशों के शासनाध्यक्ष भारत के राष्ट्रपति एवम् प्रधानमंत्री को बधाई संदेश देते हैं।
उपसंहार :
हर पर्व का जीवन में बहुत महत्व होता है। गणतंत्र दिवस को हमारे संविधान के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है यह हमारे लिए बहुत बड़ा संदेश देता है। 26 जनवरी के उत्सव को जन साधारण समाज का पर्व बनाने के लिए हर भारत वासी को इसमें जरुर भाग लेना चाहिए।
आत्म-निरिक्षण
इस दिन राष्ट्रवासियों का आत्म-निरिक्षण भी करना चाहिए और हमें यह भी विचार करना चाहिए कि हमने क्या खोया है और क्या पाया है और कैसे पाया है। यह भी विचार करना चाहिए कि अपनी निश्चित की गई योजनाओं में क्या हमें सफलता प्राप्त हुई है?। हमने जो भी लक्ष्य निर्धारित किए थे क्या हम वहाँ तक पहुंच पाए हैं। इस दृष्टि निरिक्षण करके हमें हमेशा आगे बढने का संकल्प करना चाहिए।
26 जनवरी का दिन भारतीय आत्माओं के त्याग, तपस्या, और बलिदान , की अमर कहानी के निहित होता है। हर भारतीय का यह कर्तव्य बनता है कि वह इस पर्व को उल्लास और प्रसन्नता के साथ मनाना और अपने देश की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए ।
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