स्थिरता और योग

स्थिरता और योग

स्थिरता और योग

स्थिरता और योग के मध्य सीधा सम्बन्ध है। योग का लक्ष्य स्थिरता को प्राप्त करना है। स्थिरता ही योग है। स्थिरता ही हमें धारणा, ध्यान और समाधि में ले जाने वाली है।

स्थिरता और योग के विभिन्न सोपान

साधक को योग में स्थिरता के विभिन्न सोपानों को क्रमानुसार प्राप्त करना होता है, जो इस प्रकार हैं

1. शारीरिक स्थिरता

एक अवस्था में शरीर को लम्बे समय तक ठहराने की शक्ति प्राप्त करना ही शारीरिक स्थिरता है। इसके लिए शरीर के अंग, मांसपेशियां, हड्डियां, ग्रन्थियां, प्रणालियां, पाचन, रक्त भ्रमण, श्वसन, निष्कासन आदि का स्वस्थ होना जरूरी है। इन्हें भोजन, शुद्धि क्रिया व आसनों के अभ्यास से स्वस्थ किया जा सकता है।

भोजन

जब साधक का भोजन सात्विक व सुपाच्य हो तो इससे शरीर के अंगों का पोषण ठीक प्रकार से होता है।

शुद्धि क्रिया

शुद्धि क्रियाओं के अभ्यास से शरीर में रुके हुए मलों का शोधन होता है, जिससे शरीर निरोगी बनता है तथा योगाभ्यास करना सहज हो जाता है और वह अधिक प्रभावकारी भी होता है।

आसन

जब साधक नियमित रूप से प्रतिदिन आसनों का अभ्यास करता है तो सभी प्रणालियां ठीक प्रकार से कार्य करती है- जैसे पाचन, निष्कासन, रक्त परिसंचरण, श्वसन, ग्रन्थि स्राव व मांसपेशियों का चयापचय आदि कार्य ठीक प्रकार से सम्पादित होते हैं।

हड्डियां व हड्डियों के जोड़ लचकदार होने पर साधक बिना हिले-डुले देर तक स्थिर रहकर एक अवस्था में रुकने की शक्ति को प्राप्त कर लेता है। इसी को शारीरिक स्थिरता कहते हैं।

2. प्राण की स्थिरता

प्राण की स्थिरता से हमारा अभिप्राय शरीर में प्राण-शक्ति के समविचरण से है। जब शरीर में प्राण-शक्ति का विचरण विषम अवस्था में होता है तो भौतिक शरीर के अंगों के कार्य करने की शक्ति भी घटने लगती है।

अंग अस्वस्थ होने लगते हैं। ऐसा होने पर व्यक्ति के श्वास छोटे व उखड़े हुए होते हैं। जब एक साधक शारीरिक स्थिरता प्राप्त करने पर प्राणायाम का अभ्यास करता है तो उसके श्वास गहरे, लम्बे, आनुपातिक, लयबद्ध व सूक्ष्म बनने लगते हैं। उसकी कुम्भक में रुकने की अवस्था बढ़ने लगती है। यह कार्य प्राणायाम के अभ्यास से होता है।

3. मन की स्थिरता

एक व्यक्ति जितना अधिक सांसारिक होगा, उसका मन भी उतना ही अधिक रागी, बहिर्मुखी, अशान्त व अस्थिर होगा। ऐसा व्यक्ति साधना के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता। साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए मन की एकाग्रता व स्थिरता का होना आवश्यक है।

अस्थिर मन शारीरिक व मानसिक रोगों को जन्म देता है।

हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा, अवसाद, तनाव, क्रोध, याददाश्त का कमजोर होना व चिन्ता में डूबे रहना आदि दोषों का एक महत्वपूर्ण कारण मन

का अशान्त व अस्थिर होना है। जिसका मन अश‍ व अस्थिर होता है, वह अपने आध्यात्मिक पक्ष को विकसित करने से वंचित रह जाता है। अतः ध्यान व समाधि में जाने के लिए मन की शान्त व स्थिर अवस्था को प्राप्त करना अनिवार्य है।

मन को शान्त व स्थिर करने के लिए साधक को प्रत्याहार की साधना करनी होगी । इन्द्रियों को विषयों से हटाने की साधना को प्रत्याहार कहा गया है। इन्द्रियों के विषयों पर रोक लगाना प्रत्याहार की साधना है।

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः

अर्थात् इन्द्रियों द्वारा सांसारिक विषयों से विमुख होने पर चित्त का अनुकरण करना प्रत्याहार है। जब इन्द्रियां बाहरी विषयों से हट जाती हैं तो वे चित्त के स्वभाव के अनुसार व्यवहार करती हैं। इससे मन शान्त व स्थिर होने लगता है, जो साधक की एकाग्रता को बढ़ाने वाला है। शान्त व स्थिर मन ही साधक को ध्यान की ओर ले जाने वाला है।

4. बुद्धि की स्थिरता

व्यक्ति की स्थूल बुद्धि सांसारिक निर्णय लेती है। स्थूल बुद्धि पर व्यक्ति का चंचल व अस्थिर मन हमेशा हावी रहता है, जिससे व्यक्ति ठीक व गलत अर्थात् धर्म व अधर्म के अन्तर को ठीक से समझ नहीं पाता।

इस कारण वह गलत निर्णय लेता रहता है और उसके जीवन की दिशा भी गलत हो जाती है। जब साधक मन की साधना करके उसे शान्त व स्थिर कर लेता है तो वह सूक्ष्म बुद्धि अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा को प्राप्त करता है, जो साधक को अध्यात्म की ओर ले जाने वाली होती है। इसके लिए साधक को धारणा का अभ्यास करना होगा।

जब मन शान्त व स्थिर होता है तो साधक में धारणा की योग्यता आ जाती है। शान्त मन साधक को अध्यात्म प्रसाद का लाभ देने वाला है, जो उसमें ऋतम्भरा प्रज्ञा को उत्पन्न करने वाला है। सत्य को धारण करने वाली बुद्धि को ऋतम्भरा बुद्धि कहा गया है। इसे समाधिजन्य बुद्धि भी कहते हैं।

5. चित्त की स्थिरता

जब चित्त का पूर्ण शोधन हो जाता है तो वह अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाता है । चित्त को स्थिर कर देना ही योग है।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः

अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध कर देना ही योग है। सांसारिक व्यक्ति के चित्त पर वृत्तियों की परतें चढ़ी रहती हैं, जो उसे रागी व सांसारिक बनाकर रखती हैं।

जब साधक नियमित रूप से योगाभ्यास करते हुए शारीरिक स्थिरता, प्राण की स्थिरता, मानसिक स्थिरता व बुद्धि की स्थिरता को प्राप्त कर लेता है तो धीरे-धीरे चित्त पर जमा तामसिक, राजसिक व अन्त में सात्विक वृत्तियों का निरोध होता है ।

अन्त में एक सात्विक वृत्ति, जिसे विवेक ख्याति कहा जाता है, वह शेष बचती है। जब साधक अपनी साधना को रुकने नहीं देता, उसे आगे बढ़ाता है तो साधक का विवेक ख्याति से भी मोह भंग हो जाता है। इसे सर्वचित्त वृत्ति निरोध की अवस्था कहा गया है।

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्

अर्थात् जब साधक के चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है तो चित्त अपने स्वभाव में अवस्थित हो जाता है। यह चित्त की स्थिर अवस्था है। यह 17 साधक की मंजिल है। यही समाधि कहलाती है। इसी को मोक्ष कहा गया है।

दो-तीन दिन लगातार सूरज नहीं निकलता और भयंकर ठंड पड़ती है और फिर एक दिन सूरज की किरणें फूटती दिखती हैं तो क्या वह ऊष्मा ईश्वर का रूप नहीं लगती! वायु चलना बंद कर दे तो हम श्वास कैसे लेंगे, गर्मी में राहत कैसे मिले। तो उस शीतल, मंद-मंद बहती बयार में ईश्वर के ही तो दर्शन होते हैं।

आकाश यानी खाली स्थान। यदि एक छोटे से कमरे में 8-10 लोगों को हँसकर भर दिया जाए या जेल की कोठरी में डाल दिया जाए तो जब वे बाहर निकलेंगे तो कैसा लगेगा? कोरोना में जब लॉकडाउन था, कोई बाहर नहीं निकल सकता था, तब कैसी मजबूरी, कैसी घुटन महसूस होने लगी थी। इसलिए space, खाली स्थान भी ईश्वर का ही रूप नहीं है क्या?

हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं- आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा । यदि इनमें से एक भी इन्द्री ठीक से काम न करे तो जीवन कैसा बेबस लाचार, रंगहीन, रसहीन हो जाता है। तो इन इन्द्रियों में देखने, सुनने, सूँघने, चखने और छूने की शक्ति ईश्वरीय शक्ति ही तो है ।

पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं- हाथ, पैर, मुंह, गुदा या मलद्वार तथा जननेंद्रियां। ये क्रमशः ग्रहण करने, चलने, बोलने व खाने, मल त्यागने तथा संतानोत्पत्ति का कार्य करती हैं। इसमें से एक भी यदि न हो या शक्तिहीन हो जाए तो कैसा होगा जीवन – ज़रा सोचकर देखना । और फिर अंतःकरण चतुष्ट्य – मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ।

पीछे जिन पंच तत्त्वों की बात की, हमारा शरीर भी उन्हीं पंच तत्वों से बना है। पृथ्वी तत्व यानी हमारी अस्थियाँ या हड्डियाँ, हमारा भौतिक शरीर, धातुएँ, जल तत्त्व यानी शरीर में बहता रुधिर या रक्त या खून, शरीर में बनने वाले सभी तरह के रस और एंजाइम, अग्नि तत्व यानी ऊर्जा, ऊष्मा, शक्ति, ताप और जठारग्नि । यह अग्नि तत्व भोजन को पचाकर हमें स्वस्थ रखता है।

वायु तत्त्व या वात, जिससे हम श्वास-प्रश्वास लेते छोड़ते हैं, जो प्राण और उपप्राण के रूप में हमारा जीवन संचालित करता है।

आकाश तत्त्व यानी हमारे शरीर में स्थान-स्थान पर जो खाली स्थान है, जिससे हम शरीर के अंगों को आगे-पीछे, दाएं-बाएं हिला-हुला सकते हैं, मोड़ सकते हैं।

ये सब ईश्वरीय तत्त्व नहीं तो और क्या है! और फिर सारी ग्रंथियाँ, तंत्र और प्रणालियाँ। जैसे- पाचन-तंत्र, श्वसन-तंत्र, प्रजनन-तंत्र, मस्तिष्क, प्रमस्तिष्क इत्यदि । क्या इनमें ईश्वरीय शक्ति के दर्शन नहीं होते!

कभी एक प्रयोग करना। जब भोजन करने बैठो तो एक ग्रास को मुख में रखकर जब चबाओ तो आँखें बंद कर लेना और पूरा ध्यान उस भोजन से निकलने वाले रस और स्वाद पर लगाना। तुम्हें उस अन्न के ग्रास में ईश्वर की ही अनुभूति होगी।

जब स्नान करने जाओ और शरीर पर पानी डालो तो पानी की शीतलता और गीलेपन को महसूस करना, स्नान के बाद मिलने वाली ताजगी को अनुभव करना तो ईश्वर की ही अनुभूति होगी।

जब अन्न खाओ तो सोचना वो कौन हैं जो भोजन को पचाकर उसे सप्त धातु, रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि मज्जा और वीर्य में बदल देता है। साथ ही, शरीर के फोक को बाहर निकाल देता है। ये ईश्वरीय शक्ति नहीं तो क्या है?

हम इस छोटे-से शरीर में जीवन भर खाते हैं, पचाते हैं, मल को बाहर निष्कासित करते हैं- क्या यह आश्चर्य नहीं! ये आश्चर्य ही ईश्वरीय सत्ता है।

यह संपूर्ण प्रकृति – नदियाँ, सागर, झरने, पर्वत, झीलें, ग्लेशियर, अनगिनत तरह के फूल और उन पर दिव्य पेंटिंग, अनाज, फल और उनमें तरह-तरह के स्वाद-जैसे खट्ठा, मीठा, नमकीन, कड़वा दिन, रात, साँझ, दोपहर, सूरज, चाँद, तारे, ग्रह, नक्षत्र और न जाने क्या-क्या ! यह संपूर्ण रहस्यमयी प्रकृति ईश्वर ही तो हैं।

इसी अर्थ में मैंने कहा- कण-कण में है भगवान्। यदि हम इसे ठीक से समझ लें तो खुद ही उसके प्रति नतमस्तक हो जाएंगे। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने ईश्वर को दो तरह से अभिव्यक्त किया कुछ – या तो सब वही है या नेति नेति यानी न इति, न इति अर्थात् ईश्वर केवल उतना ही नहीं, जितना दिखता है अपितु उससे कहीं अधिक व्यापक है।

यदि आप इतना भी समझ सकें तो अपने शरीर का, मन के भावों का, प्रत्येक कर्म का ध्यान रखोगे, उसका सम्मान करोगे।

इस मार्ग का अनुसरण करने से यह कार्य, यह मार्ग सुगम, सरल और सहज हो जाएगा और खुद को कमजोर नहीं समझोगे तब मेरा यह अनुभव तुम्हरा अपना अनुभव बन जाएगा और तुम भी सहज भाव से कह सकोगे कण-कण में है भागवान, ये जान लेना ही है ईश्वर प्रणिधान ।

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