श्री परमहंस दयाल जी, पूरण सुख के धाम ||विनती

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श्री परमहंस दयाल जी – विनती

॥ दोहा ॥

श्री परमहंस दयाल जी, पूरण सुख के धाम । बार बार दण्डवत करूँ, कोटिन कोटि प्रणाम ॥ 1 ॥

हाथ जोड़ विनती करूँ, सतगुरु कृपानिधान । सेवा अपनी दीजिये, और भक्ति का दान ।। 2 ।।

सुखदाता दुःखभंजना, सतगुरु तुम्हरो नाम । नाम अमोलक दीजिये, भक्ति करूँ निष्काम ॥ 3 ॥

नाव बनाई शब्द की, बहुत किया उपकार । भवसागर में डूबते, लीन्हे जीव उबार ॥ 4 ॥

तुम बिन कोई मीत नहीं, का संसार । स्वारथ बिन स्वारथ सतगुरु करें, निशिदिन पर उपकार ॥ 5 ॥

मैं निर्बल अति दीन हूँ, तुम समरथ बलवान । सब विधि मम रक्षा करो, दीनबन्धु भगवान ॥ 6 ॥

बिरद सम्भारो नाथ जी, शरणागत प्रतिपाल । बाँह गहे की लाज है, मेरी करो सम्भाल ॥ 7 ॥

समरथ सतगुरु देव जी, लीन्ही तुम्हरी ओट । तुम्हरी कृपा से मिटत हैं, जन्म जन्म के खोट ॥ 8 ॥

मैं अपराधी जीव हूँ, नख शिख भरा विकार । अपनी दया से सतगुरु, कीजै भव से पार ॥ 9 ॥

भटक भटक कर आइया, पर्या तुम्हरे द्वार । चरण-शरण में राख लो, अपनी किरपा धार ॥ 10 ॥

तुझसा मुझको है नहीं, मुझसे तुम्हें अनेक । राखो चरणन छाँव में, गही तुम्हारी टेक ॥ 11 ॥

टेक एक प्रभु आपकी, नहीं भरोसा आन । तुम्हरी किरपा दृष्टि से, पाइये पद निर्वाण ॥ 12 ॥

अनिक जन्म भरमत रहियो, पायो न बिसराम । आया हूँ तव शरण में, कृपा सिन्धु सुखधाम ॥ 13 ॥

लिव श्री चरणन में लगे, जैसे चन्द चकोर । रैन दिवस निरखत रहूँ, गुरु मूरत की ओर ॥ 14 ॥

श्री गुरु चरण सरोज में, राखूँ अपना शीश । चाहूँ तुझ से मैं सदा, प्रेम भक्ति बख़्शीश ॥ 15 ॥

पत राखो मेरे साईयाँ, दयासिन्धु दातार । बार बार विनती करूँ, सतगुरु तव चरणार ॥ 16 ॥

पारब्रह्म सतगुरु मेरे, पूरण सच्चिदानन्द नमस्कार प्रभु आपको, भक्तन के सुखकन्द ॥ 17 ॥

श्री मात पिता सतगुरु मेरे, शरण गहूँ किसकी । गुरु बिन और न दूसरा, आस करूँ जिसकी ॥ 18 ॥

जयकारा, निस्तारा, धर्म का द्वारा, झूलेगी ध्वजा, बजेगा नक्कारा, सुनकर बोलेगा सो निहाल होयेगा;

॥ बोल साचे दरबार की जय ॥

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