मनुष्य शरीर किसका द्धार ?

मनुष्य शरीर

सभी का एक ही सन्देश

मनुष्य शरीर – सभी सन्त-महापुरुष उस परमात्मा का एक ही सन्देश देते हैं। वे एक ही उपदेश, एक ही सत्य ज्ञान का प्रचार करते हैं। उनका उपदेश है कि परमात्मा मूलतः एक ही है और हमारी आत्मा उसी परमात्मा की अंश है। हम जन्म-मरण के चक्र से केवल तभी छूट सकते हैं, जब हमारी आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाये।

मनुष्य शरीर ही वह द्धार हैं

मनुष्य शरीर ही वह ठाकुर द्धार है जहाँ उस ठाकुर या प्रभु ने अपने रहने के लिए स्वयं स्थान सृजन किया है। केवल मनुष्य-देह ही वह सच्चा हरि-मन्दिर है क्योंकि इसके अन्दर ही प्रभु से मिलाप हो सकता है।

गुरुवाणी में भी मनुष्य-शरीर को हरि का महल, हरि का घर या हरि का मन्दिर कहा गया है। इसके अन्दर सदा हरि की ज्योति जल रही है। मालिक के सच्चे भक्त, इसके अन्दर ही उस हरि से मिलाप करते हैं।

काइआ महलु मंदरु घरु हरि का, तिसु महि राखी जोति अपार ॥ नानक गुरमुखि महलि बुलाईऐ, हरि मेले मेलणहार ॥

(आदि ग्रन्थ पृ० 1256)

प्रभु ईसामसीह ने भी मनुष्य देह को हरि मन्दिर कहा है।

मानुष-जन्म सृष्टि की सर्वोत्तम रचना है जो हमें मालिक की प्रगाढ़ कृपा, असीम दयालुता तथा अथाह अनुग्रह। द्वारा प्राप्त है। देवी देवता भी इस मानुष-जन्म के लिए तरसते हैं।

परमसन्त श्री कबीर साहिब जी भी फ़रमाते हैं :- गुरु सेवा ते भगति कमाई ॥ तब इह मानस देही पाई ॥ इस देहीकउ सिमरहि देव ॥ सो देही भजु हरि की सेव ॥ भजहुगोबिंद भूलि मत जाहु । मानस जनम का एही लाहु ॥ ( गुरुवाणी)

सर्वव्यापी परमात्मा का वास है

मानुष तन केवल माँस, हड्डियों और रक्त का ढाँचा नहीं है, किन्तु इसी घट के भीतर अखुट खज़ाने समाहित हैं। रोम-रोम में परमात्मा विद्यमान है।

मानुष-देह ही वह प्रयोगशाला है जहाँ सदगरु के मार्गदर्शन में हम परमात्मा को जान सकते है।

इसी ‘अणु से अणु’ अति सूक्ष्म आत्मा में उस अनन्त । परमात्मा का वास है। इसी मनुष्य शरीर, जो कि मिट्टी का पात्र है इसमें सर्वव्यापी परमात्मा का वास है। यह वह घड़ा है जिसमें समुद्र समाया हुआ है। इसलिए मनुष्य को इस गुप्त खजाने का भेद जानने का प्रयत्न करना चाहिए, इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। ‘आत्म-तत्त्व’ की पहचान व मनुष्य जन्म के चरम लक्ष्य को प्राप्त करना मनुष्य परम धर्म है

मनुष्य परमात्मा को भीतर नहीं खोज सकता तो वह उसे बाहर कहीं भी नहीं पा सकता।

 मनुष्य । जन्म को अमूल्य इसलिए कहा गया है क्योंकि मनुष्य-देह के भीतर ही परमात्मा विराजमान है। अगर मनुष्य परमात्मा को भीतर में घट नहीं खोज सकता तो वह उसे बाहर कहीं भी नहीं पा सकता। अगर उस परमेश्वर से मिलाप हो सकता है तो घट भीतर ही सम्भव है।

परमात्मा जीवात्मा में इस तरह ओत-प्रोत है कि वे हमारे शरीर में हमारे अंगों से भी करीब है।

उदाहरण दिया जा सकता है कि जैसे माँ स्वप्न अवस्था में देखती है कि उसका बच्चा खो गया है। वह निद्रावस्था में रोने लगती है। परन्तु जागने पर वह देखती है कि उसका बच्चा उसके पास गहरी नींद में सोया है तो उसे अत्यधिक शान्ति का आभास होता है। इसीप्रकार भ्रम-वश हमारी आत्मा पर मायावी पर्दा छाया हुआ है। जब यह पर्दा लुप्त हो तो हमें उस ईश्वरीय सत्ता का आभास आत्म-तत्त्व में होता है तब आत्मा पूर्ण आह्लाद से झूम उठती है।

आनंद संदेश

भजन-अभ्यास

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