प्रार्थना का महत्व

प्रार्थना का महत्व क्या है ? प्रार्थना में सबसे आवश्यक है-प्रेम और भक्ति भाव। इनके बिना प्रार्थना को प्रार्थना नहीं कहा जा सकता। भक्ति व प्रेमपूर्ण प्रार्थना का आश्चर्यजनक प्रभाव होता है। भक्त : की ऐसी तन्मयता परमात्मा को अपनी ओर शीघ्रता से खींच लाती है।

यही कारण है कि सन्त-महापुरुषों ने फ़रमाया है कि हृदय को सम्मिलित किये बिना अर्थात भावना के बिना केवल शब्द उच्चारण करने की अपेक्षा हार्दिक प्रार्थना श्रेष्ठ है

एक बार भगवान् श्री कृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को प्रार्थना का महत्व दर्शाना चाहा।


अर्जुन बाहरी दिखावे व् आडम्बर बहुत करता था। जब भी भगवान शिव की पूजा  करता, ढेरों मन फूल चढ़ाता,अगरबत्ती व दीये जलाना इत्यादि-इत्यादि।

अत्यधिक समय इन आडम्बरों के आयोजन में बिता देता लेकिन उसका भाई भीम शीघ्र ही पूजा से निवृत्त हो जाता। किन्तु वह पूजा अत्यधिक निष्ठा, लगन व ध्यान मग्न होकर करता था।

अर्जुन को अहंकार था कि वह महान् भक्त है। अतएव वह अपने भाई को नादान समझता था। भगवान श्री कृष्ण ने उसके हृदय की बात को भाँप लिया एवं उसे सबक सिखाना चाहा। उन्होंने अर्जुन के समक्ष कैलाश पर्वत की यात्रा का प्रस्ताव रखा।

उसने प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और कैलाश पर्वत की यात्रा पर भगवान् श्री कृष्ण तथा अर्जुन चल दिये। यात्रा के दौरान उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति अनेक प्रकार के सुन्दर सुगन्धित फूलों की बैलगाड़ी भरकर उसे शीघ्रता से खींचे जा रहा है।

अर्जुन हैरान हुआ और उत्सुकता वश उसने पूछा, “तुम कहाँ जा रहे हो?  व्यक्ति अधिक व्यस्त था, वह बिना उत्तर दिये वहाँ से चला गया।

भगवान श्री कृष्ण ने कहा, “अर्जुन! चलो इसका पीछा करें और पता लगायें कि वह क्या कर रहा है।उन्होंने उसका पीछा किया और शीघ्र ही उस व्यक्ति के करीब पहुँच गये। वह जल्दी-जल्दी अपनी बैलगाड़ी फूलों के ढेर के पास खाली कर रहा था। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ फूलों की अनेक बैलगाडियाँ खाली हो रही है

अर्जुन से न रहा गया। उसने फिर पूछा, “कृपा कर बतलाइये कि आप क्या कर रहे हैं?’

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, “आप मुझसे बार-बार प्रश्न कर रहे हैं मेरे पास समय नहीं है। अभी बहुत सा काम पड़ा है। अभी तो फूलों की आधी बैलगाड़ियाँ लाये हैं जो कल पाण्डु पुत्र भीम ने मन्दिर में अर्पित की थी और उसकी अगली पूजा का भी समय होने वाला है। कल के अर्पित फूल हमें उससे पहले हटाने हैं।”

अर्जुन हैरानी से बोला, “मेरा ख्याल है आपको गलती लग रही है ये पाण्डु पुत्र अर्जुन द्वारा अर्पित किये फूल होंगे।” उस व्यक्ति ने कहा- “नहीं, नहीं। ये भीम की ही भेंट है। वह अटूट श्रद्धा, लगन व एकचित्त होकर आराधना करता है। प्रेम और भक्ति से उसका हृदय ओत-प्रोत होता है। अर्जुन तो दिखावा अधिक करता है उसके द्वारा अर्पित फूल अधिक नहीं है। वह टोकरा देख रहे हो—वह ही केवल अर्जुन का है।”

अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हो गया। उसे अच्छी तरह आभास हो गया कि श्रद्धा के फूल अमूल्य हैं। | उस दिन से वह तन्मय होकर आराधना करने लगा। मन को परमात्मा के ध्यान में एकचित्त होकर लगा देना चाहिए, यही सच्ची उपासना है। पूजा में आवश्यक है पूर्णतया समर्पण।

जब हम प्रेम विभोर तथा तन्मय हो अपने सद्गुरु की निष्ठापूर्वक व विश्वास सहित आराधना करते हैं तो निश्चय ही उनकी दिव्य अनुकम्पा का मेह जीव पर अनवरत बरसता है जिससे जीवात्मा निहाल हो उठती है।

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