दुनिया में किस तरह रहना चाहिए?

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दुनिया में किस तरह रहना चाहिए?

संसार में ऐसी कोई भी वस्तु तैयार नहीं की गई, जिसकी ज़रूरत न हो या जो बिल्कुल बेकार और फ़ज़ूल हो, सिर्फ मनुष्य को उनका इस्तेमाल अक्ल और विचार के साथ करना चाहिए।

आके दुनिया में बशर को,

रहना वाजिब किस तरह ?

जिस तरह तलाब के ,

पानी में रहता है कमल

पाके दौलत फिर बशर को,

रहना वाजिब किस तरह ?

जिस तरह झुक कर रहे,

डाली वह जिसमें आये फल ।

कानूने कुदरत के मुकाबिल,

जाये इन्सां किस तरह ?

जिस तरह है शेर जाता,

सील के सीना के बल।

संसार में ऐसी कोई भी वस्तु तैयार नहीं की गई, जिसकी ज़रूरत न हो या जो बिल्कुल बेकार और फ़ज़ूल हो, सिर्फ मनुष्य को उनका इस्तेमाल अक्ल और विचार के साथ करना चाहिए। यहाँ जो चीज़ जिस काम के लिए तैयार हुई है, उससे अगर वही काम लिया जाए तो अच्छा होता है, दूसरी जगह उसको इस्तेमाल में लाने से वही चीज़ बेकार और ग़ैर मुफीद साबित होने लगती है। दूर जाने की ज़रूरत नहीं, तुम ज़रा अपने घर ही की तरफ ध्यान दो।

तुम्हारे घर में रोज़ आग जलती है, इसकी तासीर तुम जानते हो कि हाथ लगाने से जला देती है। मगर तुम अपने विचार से इससे फायदे का काम लेते रहते हो। ज़रा तुम इसको लापरवाही के साथ इस्तेमाल करो तो फिर देखो मिनटों के अन्दर सारे घर का सफाया करती है या नहीं, मगर तुम उसी घर के अन्दर उसे रखते हुए अपनी अक्ल और विचार से इसी आग से कितना काम लेते हो।

इसी तरह संसार के अन्दर जिस कदर भी चीजें पैदा की गई हैं, वे ज़रूरत से खाली नहीं हैं। सिर्फ मनुष्य को उनका इस्तेमाल कुदरती कायदे के मुताबिक करना चाहिए।

तुम्हारे घर में कई किस्म का सामान रखा रहता है, जो चीज़ जिस दर्जे की हैसियत रखती है, उसके रखने के लिए उसी किस्म की जगह बनी होती है और तुम वक्त वक्त पर सबका इस्तेमाल करते हुए उनको अपनी अपनी जगह पर हिफ़ाज़त के साथ रख देते हो।

यह तुम्हारा रोज़ का तजरबा है। कपड़े अलमारियों या ट्रंकों के अन्दर रखे जाते हैं। रुपया पैसा लोहे की पेटियों या सन्दूकों में धरा जाता है। अनाज बोरियों में भरकर रखा जाता है।

खाने पीने के सामान की अलग ही जगह होती है, पहनने की चीजें जुदा रखी जाती हैं, मवेशियों के चारे का सामान एक तरफ ही धरा होता है, पानी घड़ों में रखा जाता है, आग चूल्हे के अन्दर रहती है, ये सब चीजें अपने अपने वक्त पर तुम्हारे काम में आती रहती हैं और तुम अपनी ज़रूरत के मुताबिक सबको काम में लाते रहते हो।

पानी के मौके पर पानी, आग के मौके पर आग, कपड़े के मौके पर कपड़ा, रुपये के समय पर रुपया यानि जिस जिस सामान की तुमको जिस जिस वक्त पर ज़रूरत पड़ती है उस से काम लेकर फिर तुम जहाँ उसकी जगह होती है संभाल कर रख देते हो, ऐसा कभी नहीं होता कि पानी को आग की जगह और आग को बिस्तरे की जगह पर रखा जाए।

रुपये पैसों को बैलों के चारे की जगह और बैलों के चारे को लोहे के सन्दूक में बन्द कर दिया जाए। ज़रा इन चीज़ों के इस्तेमाल में या इनको रखने में रद्दोबदल करके देख लो। यही चीजें तुम्हारे लिए आफ़त बन जायेंगी।

सिर्फ एक आग ही को ले लो थोड़ी देर के लिए इसको बजाय चूल्हे के बिस्तरों और कपड़ों की जगह पर रख दो, फिर तुम आप ही देख लेगो कि यही आग कितनी खतरनाक सूरत अख़्तयार कर लेती है।

यानि जिस तरह हर एक चीज़ के इस्तेमाल का अपना जुदा जुदा तरीका है और हर एक के रखने की अपनी जगह मुकर्रर है और एक चीज़ की जगह दूसरी के रखने में या बे-तरीके इस्तेमाल करने में भारी नुकसान का अन्देशा है। इसी तरह उस मालिक के बैठने के लिए यह दिल की

जगह मुकर्रर है। अगर इसके अन्दर भी कोई ग़ैर चीज़ रखी जायेगी तो बहुत नुकसान होगा। यह दिल का खाना संसारी चीज़ों के रखने के लिए नहीं बना, यह मालिक के बैठने का स्थान है। इसमें और और चीज़ों का रखना गोया मालिक की निरादरी करना है।

दुनिया की चीजें तुमको मिली हैं शरीर के भोग और इस्तेमाल के लिए, न कि दिल में रखने के लिए, इनको दिल में जगह मत दो। आदमी अगर किसी औज़ार से काम लेता है तो काम करने के बाद फिर उसकी जगह पर उसको रख देता है।

यह असूल है, संसारी चीजें तुम्हारे शरीर की ज़रूरत को पूरा करने के लिए बनी हैं। बेशक इनसे अपनी ज़रूरत को पूरा करो, मगर काम निकल जाने के बाद उन को वहीं धर दो जहाँ उनकी जगह है। यह ईमानदारी है। अगर फिर काम पड़े तो फिर बरतो इसके लिए तुम्हें कोई रुकावट नहीं है।

मगर यह दिल तुम्हारा उस मालिक का तख़्त है। इसमें किसी ग़ैर चीज़ का रखना मुनासिब नहीं। जब कुदरत की तरफ से हर एक चीज़ के रखने की जगह पहले दिन से अलग अलग मुकर्रर है, तो तुम उसके असूल की ख़िलाफ़वर्जी क्यों करते हो।

तुम जानते हो कानून की ख़िलाफ़वर्जी हमेशा परेशानी का कारण हुआ करती है, यही वजह है कि तुम इस संसार में भी हमेशा दुःखी रहते हो, मरते वक्त भी

दुःख पाते हो और अपना परलोक भी बिगाड़ लेते हो। यह चीज़ें सब उस मालिक की हैं, तुमको सिर्फ थोड़े दिनों के इस्तेमाल के वास्ते दी गई हैं। अगर तुम दूसरे की चीज़ों को अपने दिल में छिपाना चाहते हो तो गोया उसकी चोरी करते हो और चोर आदमी हमेशा सज़ा का हकदार होता है।

तुम जानते हो जब कोई मनुष्य किसी के घर में मेहमान बन कर जाता है तो घर वाले उसकी बड़ी इज़्ज़त करते हैं। अच्छे अच्छे खाने खिलाते हैं और हर तरह की ख़ातिर ख़िदमत में कमाल दिखाते हैं।

क्योंकि वह समझते हैं कि यह दो दिन का मेहमान है। आखिर दो चार दिन ठहर कर चला जायेगा और वह मनुष्य भी सचमुच अपने आप को मेहमान समझता हुआ किसी भी वस्तु में दिल नहीं फँसाता, क्योंकि वह जानता है यह चीज़ें मेरी नहीं हैं, यही वजह होती है कि उस घर से चलते वक्त बड़ी इज़्ज़त और सम्मान के साथ विदा होता है।

लेकिन बरखिलाफ इसके अगर उस घर की नुमाइश को देखकर उस मेहमान की नीयत खराब हो जावे और उन चीज़ों को अपने पास छिपाना चाहे तो फिर उसका नतीजा क्या होगा?

घर वाले उसको चोरी के इल्ज़ाम में कैद करवा देंगे। वह बदनाम और बेइज़्ज़त होकर सज़ा भी भुगतेगा। आखिर वे चीजें भी उससे छीन ली जायेंगी। इसी तरह सन्त कहते हैं कि इस

दुनिया का माल तुम्हारा नहीं है। इसका मालिक कोई और है, तुम सिर्फ इसके अन्दर मेहमान के तौर पर भेजे गये हो। अगर तुम बेगाने माल को अपना बनाने की कोशिश करोगे तो याद रखो सिर्फ इस दुनिया से ही बदनाम होकर नहीं निकाले जाओगे, बल्कि अपना परलोक भी खराब कर लोगे। आखिर यह दुनिया भी हाथ से जाती रहेगी और बदनामी व ख़्वारी मुफ़्त की होगी और यही नहीं बल्कि जन्म-जन्मान्तरों तक इसका असर तुम्हारे साथ रहेगा।

कबीर दीनु गवाइआ दुनि सिउ दुनी न चाली साथि ॥ पाइ कुहाड़ा मारिआ गाफलि अपुनै हाथ ॥

गुरुवाणी

क्योंकि मनुष्य को अपनी ज़िन्दगी में जिन जिन वस्तुओं के साथ प्यार रहता है, उन सबका नक्शा इसके दिल की तख़्ती पर खिंचा रहता है।

मरते वक्त गो वह सब चीजें इससे छूट जाती हैं। मगर ख़ाहिशों का सिलसिला दिल के साथ बन्धा रहता है और जब आदमी मरने लगता है तो जो खाहिश उस वक्त दिल के अन्दर ज़बरदस्त और मज़बूत होती है वह इसके दिल को अपनी तरफ खैच ले जाती है। जिसके सबब से इन्सान मरने के बाद उस खाहिश के साथ बन्धा हुआ दूसरी योनि में जा पड़ता है। क्योंकि कुदरत का कानून इन्साफ़ पर मबनी है। जो जिस किस्म की ख़ाहिश करता है उसको उसी के मुआफ़िक जगह मिलती है।

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