झूठा धन

॥ कविता ॥ – झूठा धन


झूठा धन समर्पित करके,
ले सतगुरु से सच्चे नाम का धन ।


मिले उसे दो जहानों की दौलत,
करे गुरु को जो तन मन अर्पण ।


अपना अस्थिर मन दे सतगुरु को,
उनसे स्थिर शांत मन ले लो।


करके अपना सर्वस्व समर्पित,
अनामी अटल शाश्वत पद ले लो।


महबूब नहीं मिलेगा मोल
क्यों बाज़ारों में हो भटकते।


मन देकर ही वह मिलता,
इस बात को हो क्यों नहीं समझते।


सौदा यह है सस्ता व उत्तम,
कर लो, तनिक न करो विचार ।


गुरु से लेकर ज्ञान का दीपक,
अंतर्हदय में भरो उजियार ।


तन मन धन से सेवा कर के,
रूह को कर लो तुम आज़ाद ।


एकाकार हो परम तत्त्व में,
रहो शाद और सदा आबाद ।

पल पल में गुरु हुकम कमाओ,
समय को न करो बरबाद ।


पा कर प्रसन्नता गुरुदेव की,
कर लो अपने कारज रास ।


अपने श्री सतगुरु जी पर जाऊँ,
कोटिन कोटि बार कुर्बान ।


अखुट खज़ाने से दिया जिन्होंने,
प्रेमाभक्ति का हमको दान ।


स्थूल बुद्धि को कर दिया सूक्ष्म,
देकर अपना ज्ञान अटल ।

ए दासनदास के मन,
सदा तू भक्ति की राह पर चल ।


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