Shri Guru tegh bahadur ji

Shri Guru tegh bahadur ji

मीरी-पीरी के मालिक श्री गुरु हरिगोबिन्द जी एवं माता नानकी के सुपुत्र श्री गुरु तेग बहादुर जी ने बचपन में ही धर्म-मर्यादा का निर्वाह करते हुए गुरमति की शिक्षा के साथ-साथ शस्त्रों के प्रयोग एवं घुड़सवारी का प्रशिक्षण प्राप्त किया।

गुरु तेग बहादुर जी का विवाह बीबी गुजरी जी से हुआ एवं इन्होंने करतारपुर साहिब की चौथी लड़ाई में अपनी तेग के जौहर दिखाए। तत्पश्चात आप अपनी माता एवं पत्नी सहित अपने ननिहाल बकाला आ गए। वहीं गृहस्थी दायित्वों का निर्वाह करते हुए परमात्मा का सिमरण करने लगे।

इसी बीच गुरु हरकिशन साहिब जी दिल्ली में ज्योति जोत समाए। उससे पहले वह कह गए कि ‘बाबा बसे ग्राम बकाले’ अर्थात् गुरु गद्दी के मालिक बकाला में हैं। इस बात की चर्चा सुन कई पाखंडी गुरु गद्दी के दावेदार बनकर बकाला में एकत्रित हो गए।

धीर मल भी इनमें से एक था। भोले-भाले लोग इन पाखंडियों के आगे शीश निवाने लगे। ऐसे में हर कोई चाहता था कि असली गुरु का पता चले परन्तु कामयाबी नहीं मिल रही थी।

इस बीच गुरु साहिब के एक श्रद्धालु सिख मक्खन शाह लुबाना का जब सामान से लदा बेड़ा डूबने लगा तो इन्होंने गुरु महाराज का स्मरण किया एवं बेड़ा बचाने के लिए दसबंध की 5 सौ मोहरें गुरु घर को अर्पित करने की बात कही।

गुरु महाराज की अपार कृपा से मक्खन शाह लुबाना का बेड़ा किनारे लगा एवं वह गुरु महाराज का शुक्राना करने हेतु जेहलम से बकाला आ गया। वह गुरु महाराज को 5 सौ मोहरें अर्पित करना चाहता था।

उसे वहां पाखंडी गुरुओं द्वारा अपना डेरा जमाए देखकर असमंजस हुआ। काफी सोच-विचार के बाद उसने उन सभी गुरुओं को दो-दो मोहरें अर्पित कीं। बाद में वह गुरु तेग बहादुर के द्वार पर उपस्थित हुआ और वहां भी दो मोहरें चढ़ा दीं।

अंतर्यामी सच्चे गुरु ने मक्खन शाह को पूरा दसबंध 5 सौ मोहरें देने के वायदे की याद दिलाई। गुरु जी के मुख से ऐसी बात सुनकर खुशी से मक्खन शाह उछल पड़ा एवं छत पर चढ़कर ढिंढोरा पीटने लगा कि ‘गुरु लाधो रे, गुरु लाधो रे’ अर्थात् सच्चा गुरु मिल गया।

जब संगत को इस बात का पता चला तो वह वास्तविकता जान कर पाखंडियों को छोड़कर सच्चे गुरु की शरण में आ गई। धीरमल यह सब सहन न कर सका एवं शीहे मसन्द के साथ कई साजिशें करने लगा यहां तक कि उन्होंने गुरु घर से सामान भी लूट लिया।

जब मक्खन शाह को ऐसी बातों का पता चला तो उसने सिखों के साथ उसका पीछा किया तथा लूटा हुआ माल छीन लिया। वह ‘आदि ग्रंथ को ले आए परन्तु नम्रता के पुंज सत्गुरु जी ने धीरमल की कुटिलता को भी अनदेखा किया।

कहलूर के राजा से माखो वाल की भूमि खरीद कर आपने श्री आनन्दपुर साहिब नगर बसाया। गुरु जी अपने परिवार को पटना छोड़कर कई स्थानों का भ्रमण करते हुए श्री आनंदपुर लौटे। इसी बीच पटना में (गुरु) गोबिंद सिंह जी का जन्म हो चुका था। उधर औरंगजेब का हिंदुओं पर जुल्म ढाने का सिलसिला थमने की बजाय बढ़ता ही जा रहा था।

श्री आनंदपुर लौट कर गुरु तेग बहादुर जी ने परिवार को भी श्री आनन्दपुर साहिब बुलवा लिया। इस बीच कश्मीर में शेर अफगान ने तलवार के जोर पर कश्मीरी पंडितों को मुसलमान बनाना शुरू कर दिया।

तब कश्मीरी पंडित श्री आनंदपुर साहिब में गुरु तेग बहादुर जी के समक्ष अपनी फरियाद लेकर आए। उनकी बात सुनकर गुरु साहिब ने उन्हें आश्वासन दिया कि गुरु घर से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा है इसलिए वे निश्चित रहें।

औरंगजेब को जवाब देने के लिए श्री गुरु तेग बहादुर जी भाई मति दास, भाई सति दास, भाई जैता जी तथा भाई दयाला जी सहित कुर्बानी देने के लिए दिल्ली रवाना हो गए। जब गुरु तेग बहादुर और बादशाह औरंगजेब का सामना हुआ तो औरंगजेब ने गुरु साहिब को इस्लाम कबूल करने के लिए कहा।

इस्लाम कबूल न करने पर औरंगजेब ने गुरु साहिब और उनके साथियों को शहीद करने का आदेश दिया। गुरु जी को डराने के लिए औरंगजेब के आदेश से भाई मति दास जी, भाई दयाला जी तथा भाई सती दास को यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया।

तत्पश्चात 1675 को चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी का शीश काटकर उन्हें शहीद कर दिया गया। गुरु तेग बहादुर जी की बेमिसाल शहादत ने इतिहास में एक नया पन्ना लिख दिया। भाई जैता जी किसी तरह गुरु जी का शीश लेकर श्री आनंदपुर साहिब पहुंचे।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु तेग बहादुर जी का शीश सम्मान सहित प्राप्त करते हुए भाई जैता जी को ‘रंघरेटा, गुरु का बेटा’ कहकर आशीर्वाद दिया। गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी न केवल समकालीन समाज बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनी।

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