सत्य और असत्य क्या है ?

सत्य और असत्य की परख

गुरुमुखो! शास्त्रों में लिखा है ‘सत्यमेव जयते’। सत्य की सदैव विजय होती है और यह सत्य वस्तु क्या है ? यह सत्य वस्तु है मालिक का नाम। जिसके हृदय में नाम का वास होता है, वही सच्चा पुरुष है और उसकी वाणी भी सत् होती है।

आसा दी वार में फ़रमाया है

सतगुरि मिलिऐ सचि मिले सचि नामि समाइआ ॥ मेरी मेरी करदे घटि गए तिना हथि किहु न आइआ ॥

अर्थात् सत्पुरुषों के सान्निध्य में आकर जीव सत् वस्तु को प्राप्त कर लेता है।

सत्य वस्तु क्या है

वह सत् वस्तु क्या है-मालिक का नाम । नाम की प्राप्ति हो जाने के बाद उसकी सुरति नाम में पूर्णतया लीन हो जाती है और वह शाश्वत आनन्द की अनुभूति करता हुआ उसी में समा जाता है। इसके विपरीत अहंकारवश मैं मेरी में गलतान रहने वाले जीवों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है और उनके हाथ पल्ले भी कुछ नहीं आता।

संसार में अलग अलग श्रेणी का कार्य करने के लिए उससे सम्बन्धित वस्तुओं को खरीदना व एकत्रित करना पड़ता है।

जैसे खेती का काम करने वाले को बैल, हल, बीज इत्यादि एकत्रित करने पड़ते हैं। कपड़े वाले को कैंची, गज़, और कपड़ा आदि लेना पड़ता है। वैद्य को औषधियां रखनी पड़ती हैं। वैसे ही सत्य की प्राप्ति करने वाले को सत्पुरुषों की संगति अति अनिवार्य है और उसे उनके वचनों पर पूर्ण आस्था रखने में ही लाभ है।

संत फ़रमाते हैं कि इस संसार को भवसागर की न्याई समझो और इस जीवन को नाव। अगर नाव पानी के ऊपर चलेगी तो तैरेगी और उसमें बैठे हुए भी तर जाएंगे।

अगर जल नाव के अंदर आ गया तो नाव डूब जाएगी और उसमें बैठे हुए भी डूब जाएंगे। ऐसे ही जीव अगर संसार में रहे तो कोई भय नहीं, लेकिन संसार को अपने हृदय में स्थान न दे।

अर्थात् अगर सुरति संसार रूपी सागर के ऊपर होगी तो स्वतन्त्र रहेगी और यदि संसार के ख्यालों के प्रभाव में आ गई तो वह नीचे दब जाएगी। एक आदमी मोटर में बैठकर सफर करे और दूसरे आदमी के ऊपर मोटर चढ़ जाए तो दोनों परिस्थितियों में कितना अंतर होगा ?

प्रत्येक इन्सान को यह देखते रहना चाहिए कि वह ख्याल के वश में है या ख्याल उसके वश में हैं। बस इस छोटी सी बात में ही बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। जैसे डूबने से मौत व तैरने से ज़िंदगी मिलती है।

जैसे उचित उत्तर लिखने से परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं वैसे ही अनुचित उत्तर लिखने से अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। जैसे सोना कसौटी पर परखते हैं वैसे ही विचार संतों की वाणियों द्वारा परखे जाते हैं। जैसे सरकारी कानून की जानकारी के लिए वकील से सलाह लेनी पड़ती है वैसे ही रूहानियत के नियमों को जानने के लिए संत सद्गुरु की सलाह उपयोगी सिद्ध होती है।

संत सद्गुरु का सान्निध्य

बड़े पुण्य कर्मों से ऐसा संयोग बनता है जो जीव को सत्य असत्य की परख कराने वाले संत सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त होता है। जीव को दृढ़ निश्चय के साथ सत्य की राह पर ही चलना चाहिए।

जैसे किसी ने यदि सोने की अंगूठी पहन रखी हो, लोग भले ही उससे कितना ही कहें कि यह पीतल की है तो भी वह उनकी बात पर विश्वास नहीं करेगा।

अगर लोगों के कहने पर सोने की अंगूठी फेंक दे तो निश्चय ही ठगा जाएगा। अधिकतर लोग धन पदार्थ के मिलने को ही भाग्य की निशानी समझते हैं लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी ने तुलसी सतसई सटीक में फ़रमाया है –

असन बसन सुत नारि सुख, पापिहुके घर होय । सन्त समागम रामधन, तुलसी दुर्लभ दोय ॥

संसारी जीवो पर माया का प्रभुत्व

संसारी जीवों पर माया ने अपना प्रभुत्व जमा रखा है। वे माया व मायावी सामानों को सर्वोपरि मान अपनातन मन उसी में ही लगाये बैठे हैं।

परन्तु भाग्यशाली वे हैंजिन्हें सत्पुरुषों का संग मिल गया क्योंकि वे सत्पुरुषों के वचनों को हृदयंगम कर असत्य पदार्थों का त्याग कर देते हैं और सत् वस्तु जो मालिक का नाम है उसका नियमपूर्वक अभ्यास करके परम आनन्द एवं परम शान्ति को अनुभव करते हैं।

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