सतगुरु शब्द उलंधि कर

सतगुरु शब्द उलंधि कर

कितने ही किस्म व संस्कारों के लोग

सतगुरु शब्द उलंधि कर- सद्गुरु के दरबार में कितने ही किस्म व संस्कारों के लोग आते हैं। जिनके संस्कार ऊँचे होते हैं वे हुकम के पाबन्द रहकर सद्गुरु की कृपादृष्टि प्राप्त कर लेते हैं।

परन्तु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हुकम की अवहेलना करके अपने बहुमूल्य समय को आलस्य एवं व्यर्थ के वाद विवाद में ही व्यतीत कर देते हैं।

गुरु भक्ति की चाहना रखने वालों को सद्गुरु की आज्ञा का पाबन्द होकर रहना अति आवश्यक है।

एक दृष्टान्त है- सत्पुरुष श्री गुरु अर्जुनदेव महाराज जी के दरबार में एक सेवक रहता था। वह भंडारे से लंगर आदि तो ग्रहण करता था परन्तु दरबार की कभी कोई सेवा नहीं करता था।

दरबार का कोई सेवक उसे सेवा के लिए कहता तो वह यही जवाब देता कि मैं तो श्री गुरुमहाराज जी का सेवक हूँ न कि आपका।

मुझे तो श्री गुरु महाराज जी जो सेवा देंगे, मैं वही सेवा करूँगा। धीरे धीरे यह बात श्री गुरु महाराज की के चरणों तक भी पहुँच गई।

सेवा एक सार वस्तु है

एक दिन श्री गुरु महाराज जी वचन फ़रमा रहे थे कि सेवा एक सार वस्तु है जिससे मन शुद्ध और पवित्र होता है। जिन अंगों से सेवा की जाती है वे अंग भी पवित्र होते हैं।

सेवा बिना शरीर किस काम का, इसका कोई भी अस्तित्व नहीं। इसलिए गुरु की सेवा में ही जीव का कल्याण है।

जो गुरुमुख सच्चे दिल से सेवा करते हैं वे सद्गुरु की प्रसन्नता के पात्र बनकर अपना जन्म सफल कर लेते हैं।

ये वचन सुनकर वह सेवक उठकर खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा कि हे कृपानिधान ! मैं भी आपका सेवक हूँ और आपकी हर आज्ञा मानने को तैयार हूँ।

आप मुझे जो भी सेवा प्रदान करेंगे मैं उसे सहर्ष स्वीकार करूंगा फिर भले ही आप मुझे आग में कूदने का आदेश क्यों न दे दें।

श्री गुरु महाराज जी ने फ़रमाया- अच्छा, अगर तुम हमारे हुकम को मानकर आग में जलने के लिए तैयार हो तो वहाँ उस जंगल में चिता बनाकर उसमें अग्नि प्रज्वलित कर उसमें कूद जाओ।

श्री गुरु महाराज जी की यह आज्ञा सुनकर वह जंगल की तरफ चला गया और वहाँ जाकर चिता के लिए लकड़ियां एकत्रित करने लगा।

परन्तु मन ही मन जलने के ख्याल से घबराने लगा। सोचने लगा कि शायद श्री गुरु महाराज जी किसी सेवक को भेजकर मुझे वापस बुला लें।

इसी उधेड़बुन में लकड़ियां एकत्र करके व चिता में आग देकर वह उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगा।

इतने में एक चोर वहाँ से गुज़रा, जो किसी बड़े खज़ाने से चोरी करके बहुत सारा धन माल लेकर जा रहा था।

उस चोर ने जब उस सेवक को चिता के चारों ओर चक्कर काटते हुए देखा तो कौतूहलवश पूछा कि यह तुम क्या कर रहे हो ?

उस सेवक ने अपने श्री गुरु महाराज जी का हुकमनामा कह सुनाया और यह भी कहा कि वह मरना नहीं चाहता।

बिना किसी कारण प्राणों को त्यागने में उसे कोई लाभ दिखाई नहीं देता। उस सेवक से गुरु का हुकम सुन चोर के पुराने संस्कार जाग उठे।

उसने बड़ी विनम्रता से कहा कि मेरे पास चोरी किया हुआ लाखों का माल है, अगर तुम्हारी सहमति हो तो यह सब माल तुम ले लो और बदले में मुझे गुरु का हुकम दे दो।

उस सेवक ने दिल में सोचा कि भगवान ने कितना भला किया कि जो ऐसे मूर्ख आदमी को मेरे पास भेजा जो माल भी दे रहा है और बदले में जलकर मरने को भी तैयार है।

एक तो जान बची और दूसरा धन माल भी मिल रहा है, ऐसा सौदा करने में क्या हानि है?

उसने झट से चोर को कहा कि मुझे तुम्हारी बात स्वीकार है। तुम गुरु का हुकम ले लो और बदले में यह धन माल मुझे दे दो।

चोर ने तुरन्त सब माल उसके हवाले किया और स्वयं चिता में कूद गया। चोर के चिता में कूदते ही एक नूरानी प्रकाश हुआ जो चारों ओर फैल गया।

यह चमत्कार देखकर भी वह अज्ञानी सेवक कुछ न समझ पाया।

वह चोर से प्राप्त हुए धन माल को समेट ही रहा था कि सिपाही चोर की खोज करते हुए वहाँ आ पहुँचे और उसे पकड़कर शहर के हाकिम के सामने पेश कर दिया।

हाकिम ने पूछा कि चोरी करने के अपराध में तुम्हें क्या सज़ा दी जाए?

सेवक बोला- हज़ूर! मैं चोर नहीं हूँ और न ही मैंने चोरी की है। वास्तव में मुझे मेरे श्री गुरु महाराज जी ने हुकम किया था कि तुम चिता जलाकर उसमें कूद जाओ।

मैंने चिता तो जलाई लेकिन मेरा मन जलने के लिए तैयार नहीं था। इतने में एक चोर आया और वह लूट का सारा माल मुझे देकर बदले में मुझसे श्री गुरु महाराज जी का हुकम लेकर चिता में कूद गया।

चोरी तो उसने की थी जो कूद कर मर गया, मैं दोषी नहीं हूँ और न ही किसी प्रकार के दंड का अधिकारी हूँ।

हाकिम ने कहा कि यहाँ चतुराई काम नहीं आएगी। तुम तो श्री गुरु महाराज जी के हुकम के चोर हो।

श्री गुरु महाराज जी के हुकम का उल्लंघन करके तुमने जो महापाप किया है उसके लिए तुम्हें कड़ी सज़ा दी जाएगी। उसने अपने सिपाहियों को आदेश देकर उसे मरवा डाला।

॥दोहा॥

सतगुरु सबद उलंधि कै, जो सेवक कहिं जाय । जहाँ जाय तहँ काल है, कह कबीर समुझाय ||

गुरु सीढ़ी तें ऊतरै, सबद बिहूना होय । ता को काल घसीटि है, राखि सकै नहिं कोय ॥

(परमसन्त श्री कबीर साहिब जी)

परमसन्त श्री कबीर साहिब जी उपदेश देते हुए वर्णन करते हैं कि सद्गुरु के वचन का उल्लंघन करके सेवक कहीं भी चला जाए पर काल के चंगुल से कभी नहीं बच सकता।

जो गुरु के वचनों को हृदय में धारण नहीं करते उन्हें काल अपने मुख में घसीट लेता है। काल का ग्रास बने ऐसे जीव की कोई रक्षा नहीं कर सकता।

सद्गुरु के वचनानुसार अपने जीवन को ढाल लेने से ही जीव काल पर विजय प्राप्त करके अपने जन्म को सकारथ कर सकता है।

Richa: