बुद्धि कैसी होनी चाहिए?

परमार्थ की राह में गुरु की कृपा के बिना सब बुद्धियाँ थोथी हैं

बुद्धि कैसी होनी चाहिए?

बुद्धि कैसी होनी चाहिए? महापुरुष हमे बताते है की उनके वचन तो सब पर एक बराबर उतरते है परन्तु सब लोग उनसे एक बराबर लाभ क्यों नहीं उठाते, यह एक प्रश्न है?

लोग चार प्रकार की बुद्धि वाले होते हैं।

एक बुद्धि होती है जल की लकीर, जो खिंचती तो दिखाई देती है परन्तु साथ-साथ मिटती भीजाती है। ऐसी बुद्धि वाले जीव एक कान से सुनते और दूसरे कान से निकालते जाते हैं।
दूसरी बुद्धि है रास्ते की लकीर, जो थोड़ी देर रह कर मिट जाती है। ऐसी बुद्धि वाले जीव सत्संग के वचनों को कुछ देर तो याद रखते हैं, लेकिन । ज्योंहि मन के अन्दर कोई दूसरे संकल्प आ गये, तब वचन ! भूल गये।


तीसरी बुद्धि है पत्थर की लकीर, जो दिन-ब-दिन है घटती तो है पर बढ़ने नहीं पाती। ऐसी बुद्धि वाले जीव : वचनों को सुनकर अपने अन्दर दृढ़ तो कर लेते हैं परन्तु समय बीतने पर धीरे-धीरे वह वचन भी भूल जाते हैं।


चौथी बुद्धि है जल में तेल की बूंद की भाँति। जल में एक ! बूंद तेल की डाल दो, वह फैल जाती है तथा अनेक प्रकार : के रंग उसमें से निकलते हैं। ऐसी बुद्धि वाले जीव जब एक वचन को सुन लेते हैं, तो उस वचन से अपने विचार द्वारा अनेक लाभ उठाते हैं। उनका हृदय जल के समान होता है।


जब वचनरूपी बूंद उसमें जा गिरती है, तो अनेक प्रकार के रंग दिखाती है। ऐसे जीव महापुरुषों के वचनों से केवल आप ही लाभ नहीं उठाते बल्कि उनके द्वारा दूसरे अनेकों को लाभ पहुँचता है। परन्तु ऐसी बुद्धि वाले जीव संसार में बहुत कम होते हैं।

इस जगत् में पहली तीन प्रकार की बुद्धियों वाले जीव तो बहुत दिखाई देते हैं, लेकिन इस चौथी बुद्धि को कोई विरले जन ही पाते हैं। चाहे संसार हो या परमार्थ, ऐसी बुद्धि वालों की पूरी कीमत होती है।

कथा है-एक सेठ था, उसके दो नौकर थे। एक घरेलू काम का, दूसरा कारोबार में सलाहकार था। जो कारोबार में सलाहकार मुलाज़िम था, वह सेठ के साथ था l कुर्सी पर बैठकर सलाह-मशवरा देता रहता था तथा जो घरेलू मुलाज़िम था, वह हाथ-पाँव से तथा दूसरे मेहनत के छोटे-मोटे कई काम करता था। घरेलू मुलाज़िम की तनख्वाह पचास रुपये मासिक थी और सेठ के साथ बैठनेवाले की तनख्वाह पाँच सौ रुपये मासिक थी।

एक दिन घरेलू मुलाज़िम के दिल में संकल्प उठा कि मैं सारा दिन काम करता हूँ तो मुझे पचास रुपये मिलते हैं और यह सारा दिन बैठा रहता है, तो इसको सेठ पाँच सौ रुपये देता है। इस संकल्प को एक दिन उसने सेठ के आगे रखा कि यह मेरे साथ अन्याय है। सुनकर सेठ चुप हो गया।

दूसरे दिन उस शहर के पास से कुछ व्यापारी गुज़रे जो ऊँटों पर कपास लादकर मण्डी में बेचने जा रहे थे। सेठ ने घरेलू मुलाज़िम से कहा कि उन व्यापारियों से जाकर पूछो कि उन्होंने ऊँटों पर क्या लादा हुआ है? वह गया और पूछकर वापस आ गया। सेठ जी! ऊँटों पर कपास लदी जा रही है। फिर दूसरे मुलाज़िम को भेजा। उसने जाकर व्यापारियों से कहा- “ऊँटों पर क्या लदा है?’
वे बोले—’कपास है।’ उसने पूछा-‘कहाँ ले जा रहे हो?’ वे बोले- ‘मण्डी में जाकर बेचेंगे।’

उसने सोचा, कपास तो कुछ दिनों तक महंगी होने , वाली है। यह सोचकर व्यापारियों से बोला-‘अगर मण्डी, के भाव यह कपास हम आपसे यहाँ ही खरीद लें तो क्या आप दे दोगे?’ वे बोले- ‘हमको कोई एतराज़ नहीं है।’भाव कि सेठ के उस मुलाज़िम ने सारी कपास को खरीद लिया और सेठ के गोदाम में भरवा दिया।

वक्त आया, कपास महंगी हो गई और उस सेठ को दुगना:चौगुना लाभ हो गया। तब उसने घरेलू मुलाज़िम से कहा,भैया अब बताओ, तुम्हारी बुद्धि और उसकी बात कर कीमत एक है, जो तुम उसके साथ ईर्ष्या करते रहते हो?’
हमारे पास तो अक्ल और समझ की कीमत है। जैसे जिसकी बुद्धि होती है, उसके साथ वैसा बतोव रखना पड़ता है, यह नीति है। आगे के लिये ऐसा संकल्प मत उठाया करो। वह हमारा अपना नहीं और तुम बेगाने नहीं। परन्तु व्यवहार तो सब की बुद्धि अनुसार ही हुआ करता है।

ऐसे ही परमार्थ में भी है। यहाँ भी सब की एक बुद्धि वाले जीव नहीं होते। सब भिन्न-भिन्न विचारधारा तथा भिन्न-भिन्न बुद्धि रखनेवाले हुआ करते हैं। जैसी जिसकी बुद्धि होती है, महापुरुषों की तरफ से भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव होता है।

यह तो हुई नीति की बात। लेकिन यथार्थ यह है कि परमार्थ की राह में गुरु की कृपा के बिना है सब बुद्धियाँ थोथी हैं। गुरु की कृपा सब में चाहिये, तब परमार्थ सिद्ध होगा।

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