आनंद के स्त्रोत

आनंद के स्त्रोत को पाने के लिए हमे संत महा-पुरुषो ने नट की कथा द्वारा हमे समझाया है कितनी आवश्यकता है। हमारे जीवन में संत महापुरुष ही हमारे आनंद के स्त्रोत है। महापुरुषों का कहना है—मनुष्य उस पदार्थ को कैसे प्राप्त कर सकता है।

जबकि उसकी खोज वहां की जा रही है जहां वह है ही नहीं। यदि जिज्ञासु उसको जानने वाले किसी जानकार को साथ ले ले तो वह उसे बड़ी आसानी से प्राप्त कर सकता है।

 सद्गुरु से दीक्षा लेने वाले शायद प्रारम्भिक अवस्था में ‘शब्द’ का अर्थ अच्छी तरह से नहीं समझ पाते हैं क्योंकि अधिकांशत जिज्ञासुओं की यह सामान्य धारणा होती है कि जब एक बार सद्गुरु किसी साधक को दीक्षा दे देते हैं तो उसके बाद उनकी ज़िम्मेवारी समाप्त हो जाती है।

परन्तु हकीकत इसके विपरीत है। वास्तव में सेवक को दीक्षा देने के बाद ही सदगुरु का असली कार्य प्रारम्भ होता है क्योंकि तभी से वह अपने शिष्य की हर क्रिया पर अपनी नज़र रखते हैं और उसे सांसारिक दलदल से खींचकर बाहर निकालने के लिए गुप्त रूप से सहायता करते हैं।

जैसे-जैसे हम इस मार्ग में आगे बढ़ते हैं उतनी ही अधिक हम उनकी गुप्त संहायता को अनुभव करते हैं।

निम्न दृष्टांत से यह बात और भी स्पष्ट हो जाएगी।

एक नट की कथा

एक नट था। उसके परिवार में वह स्वयं, उसकी पत्नी तथा एक छोटा लड़का था जिसे उसने बचपन से ही पाला पोसा था। लड़का बहुत सुंदर तथा तीक्ष्ण बुद्धि वाला था।

वह लड़का बाँस पर ऊँचे चढ़ जाया करता था और नट बाँस को  नीचे से कस कर पकड़े रखता था तथा उसकी पत्नी ढोल बजाया करती थी।

 बाँस पर चढ़ कर वह लड़का बड़ी चतुराई से अनेकों करतब दिखाया करता था और उसका पिता जो उसका शिक्षक भी था, तबतक उस बाँस को कसकर पकड़े रखता था।

दर्शक उसके करतबों को देखकर प्रसन्न हुआ करते थे तथा उसके खेल में निपुणता की प्रशंसा करते हुए उसे उदारता से धन दिया करते थे।

काफी समय तक इस प्रकार काम चलता रहा और लड़के ने अपने करतबों में पूर्ण कुशलता प्राप्त कर ली। इससे उन लोगों की आय भी पर्याप्त मात्रा में बढ़ गई।

एक बार लड़के. के मन में ख्याल आया कि वह अपनी जान को खतरे में डालकर लोगों का मनोरंजन करता है और इतनी अधिक आय का साधन वह ही है। उसके पिता और माता (नट और उसकी पत्नी) तो खेल में नगण्य ही होते हैं।

नट, जिसने उसे यह करतब सिखाये थे, बहुत चतुर था और वह लड़के के मन की बात भाँप गया। अगले दिन जब लड़का बाँस पर चढ़ा और अपनी कलाबाज़ी के पूरे कौशल पर था, नट ने बाँस की पकड़ को ढीला कर दिया। लड़का मिट्टी के ढेले के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा।

 तब उसे समझ में आया कि अपने गुरु नट की मजबूत पकड़ के कारण ही वह निडरता से अपने करतब दिखा सकता है। नट के बगैर वह कुछ भी नहीं है।

इसमें विषय का गुप्त रहस्य है

इसमें विषय का गुप्त रहस्य है। साधक अपने भीतर जितना ऊँचा जाता है, उसे सतगुरु की आवश्यकता उतनी ही अधिक होती है। वो ही हमारे आनंद के स्त्रोत है

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