आत्मा-सागर की एक बूंद

हमारी आत्मा अजर, अमर, अजन्मा है, उस महासमुद्र में सागर की एक बूंद है सत्य, नित्य, अगोचर ईश्वर सत्ता की अंश और आत्मा-सागर की एक बूंद है। जिसके अस्तित्व का न कोई आदि है, न अन्त-पूर्णरूपेण सर्वशक्ति, जीवन तथा आनन्द का स्रोत है।

परमेश्वर का निवास शरीर के भीतर है। प्रभु ईसामसीह कहते – हैं, “परमेश्वर का राज्य तुम्हारे भीतर है।”

गुरुवाणी में भी कहा गया है :

आतम महि रामु राम महि आतमु । चीनसि गुर बीचारा ॥

जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध भी अद्भुत है। जसे जीवात्मा हम में है और उसी तरह परमात्मा भी है लेकिन कितने आश्चर्य की बात है कि दोनों एक साथ रहते हैं लेकिन फिर भी आत्मा परमात्मा को नहीं पहचानती।

यह विचारने योग्य बात है कि आत्मा व परमात्मा दोनों एक ही घर में मनुष्य-शरीर में निवास करते हैं। जीवात्मा उसी परमात्मा की अंश है जैसे समुद्र और लहरें, सूर्य व किरणें एक दूसरे से अभिन्न हैं। परमात्मा सदैव हमारे साथ है और हमारे भीतर है। वह हम में पूर्णतया व्याप्त है।

एक शिष्य ने एक बार अपने सद्गुरुदेव से प्रश्न किया

“गुरुदेव! परमात्मा तो अनन्त है, सर्वशक्तिमान् है” फिर किस प्रकार हमारी आत्मा जो अत्यन्त सूक्ष्म है, उसमें परमात्मा विद्यमान है?”

करुणासदन सद्गुरु ने कहा, “प्रेमी! जरा जाओ, मेरे लोटे में गंगाजल ले आओ।”

शिष्य तुरन्त ही गया और लोटा गंगाजल से भरकर ले आया। उसने वह लोटा अपने गुरुदेव के हाथों में दे दिया।

गुरुदेव ने पूछा- “मैंने तो तुम्हें कहा था गंगाजल ले आना?”

नम्रतापूर्वक शिष्य ने उत्तर दिया, “गुरुदेव! मैं * गंगाजल ही लेकर आया हूँ।”

गुरुदेव ने किंचित क्रोधित स्वर में कहा, “यह गंगाजल कैसे हो सकता है?”

शिष्य ने फिर उत्तर दिया, “गुरुदेव मैं गंगा नदी से ही लेकर आया हूँ।” ।

गुरुदेव ने सन्देहपूर्वक कहा-“तुम कह रहे हो कि यह गंगाजल है, किन्तु गंगा नदी में तो लोग स्नान कर रहे होते हैं, जल में मछलियां आदि तैरती हैं इत्यादि-इत्यादि?” फिर यह गंगाजल कैसे हुआ?

शिष्य ने उत्तर दिया, “गुरुदेव! गंगाजल तो मैं एक छोटे से बर्तन में लाया हूँ, इस परिमित पात्र में सब कुछ किस प्रकार दृष्टिगोचर हो सकता है।”

सतगुरुदेव ने सारगर्भित शब्दों से शिष्य की अज्ञानता का निवारण किया, “तुम सत्य कह रहे हो।

आत्मा-सागर की एक बूंद है क्यूंकि

जीवात्मा भी ठीक ॐ इसी प्रकार मानव देह में परिमित है किन्तु उसी ईश्वरीय सत्ता की अंश है। जिस प्रकार यह जल जब तुम नदी में वापिस डालोगे तो वह गंगा की धारा में एकरूप हो जाएगा। उसी प्रकार आत्मा अपने अंशी परमात्मा में विलीन हो जाएगी।”

सद्गुरु कृपा की संपत्ति जैसा दूसरा कोई खजाना विष्वभर में नहीं

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