अमूल्य स्वांस

परमसन्त श्री कबीर साहिब जी

अमूल्य स्वांस – परमसन्त श्री कबीर साहिब जी कपड़ा बुनने का काम करते थे। एक दिन उन्होंने अपने परिवार से कहा अब मुझसे संसार का यह झूठा धंधा नहीं होता। वे कहा लगे कि सुबह जो तानी से नली को निकालने के लिए फूंक देनी पड़ती है, मेरा वह स्वांस नाम के बिना व्यर्थ जाता है इसलिए अब मैं यह काम नहीं करूंगा।

कहा कीहै-

“ये दम हीरा लाल है गिनिगिनि गुरु को सौंप।” अर्थात् अपना हर स्वांस सद्गुरु को अर्पण कर दो। सद्गुरु स्वयं तुम्हारी संभाल करेंगे और समय आने पर उन्हें अर्पित की गई पूँजी को कई गुना अधिक करके तुम्हें वापस दे देंगे।

श्री गुरु महिमा में वर्णन आया है

गुरु की अद्भुत है प्रभुताई ।

मिले सहस्र गुना होय आई ॥

 सद्गुरु दयाल हो जाएं तो पलक झपकते ही रंक का राजा बना सकते हैं। केवल केवल अपनी सुरति को उनक चरणों से जोड़ने की आवश्यकता है।

हर समय यह ध्यान रहे कि तुम्हारे स्वांस कहाँ खर्च हो रहे हैं?

इन्द्रियां व मन किस तरफ आकर्षित हो रहे हैं?

आँखों से यदि सद्गुरु ध्यान हो रहा है तो कमाई निश्चय ही बढेगी और मन के ख्यालों से अश्लील दृश्य देखने से स्वांसों की पूँजी व्यर्थ चली जाएगी। इसी प्रकार कानों से सदगुरु की महिमा सुनने से लाभ होगा। इसके विपरीत किसी की निंदा सुनने रूहानियत के धन में उतनी ही कमी आती जाएगी। इसलिए हर क्षण अपने मन व इन्द्रियों को सद्गुरु से जोड़े रखने में ही भलाई है।

आनंद संदेश

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