सुरत शब्द योग – सतगुरु प्रेमिओं के लिए ध्यान करने का तरीका

सुरत शब्द योग का अर्थ

सुरत शब्द योग

सुरत का अर्थ – आत्मा , शब्द का अर्थ – नाम (जो सतगुरु द्वारा हमे मिला है ) , योग का अर्थ – मिलन (आत्मा का परमात्मा से मिलान )

जो प्रक्रिया आत्मा को अपने मूल स्त्रोत परमात्मा की ओर ले जाये उस अन्तर्मुखी प्रक्रिया को सुरत शब्द योग कहा जाता है।

सुरत शब्द योग

सुरत शब्द योग मानसिक शान्ति प्राप्त करने का यही एकमात्र वैज्ञानिक उपाय है। सन्त-महापुरुष संसार से ऐसी कोई भी बात गुप्त नहीं रखते जो लोगों के लाभ के लिए हो। कोई भी वस्तु जो उनके लिए उपयोगी हो, सन्तजन बड़ी प्रसन्नता से उन्हें देने के लिए तत्पर रहते हैं।

परन्तु, फिर भी, कुछ बातें ऐसी होती हैं जो गुरुदीक्षा न लिए हुए लोगों के लिए लाभकारी नहीं होतीं और इसलिए ऐसी बातें महापुरुष उन्हें नहीं बताते।

इसलिए यहाँ पर केवल वही बताया जा रहा है जो दीक्षित गुरुमुखों के लिए उपयोगी है बशर्ते कि वे गुरु की आज्ञानुसार उसका अभ्यास करें।

सुरत-शब्द-योग या सहज योग पूर्ण महापुरुषों का विज्ञान है। यह हठयोग, राजयोग, अष्टांग योग, प्राणायाम, लय योग, कर्मयोग, भक्तियोग और मंत्रयोग-इन सभी योगों से अधिक आसान, सर्वोत्तम तथा पुरातन है।

केवल एक यही योग है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। विभिन्न सम्प्रदायों के लोगों ने अपनी भावनाओं के अनुसार विभिन्न योगों को अपनाया परन्तु समय के प्रवाह में उनमें अनेक परिवर्तन हो गए।

इस विज्ञान में कुछ निश्चित प्रकार के अभ्यास होते हैं जिन को करने से साधक ईश्वर का सचेतन साक्षात्कार कर सकता है।

यह सभी प्रक्रियायें ‘ध्वनि तरंग’ की पद्धति के अन्तर्गत हैं। इस पद्धति की अपनी कुछ पृथक् विशेषताएँ हैं, जो इसे योग की अन्य पद्धतियों से पृथक् करती हैं। यह महापुरुषों के उपदेशों की आधार है।

इस ‘ध्वनि तरंग‘ के बिना महापुरुषों के उपदेश अधूरे हैं। कोई भी पद्धति ‘ध्वनि तरंग’ के इस मुख्य सिद्धान्त के बिना शिष्य को महापुरुषों के वास्तविक लक्ष्य, अध्यात्म के उच्चतम स्थान पर नहीं ले जा सकती ।

यह कहना असंगत न होगा कि जो इस ‘ध्वनि तरंग’ के सिद्धान्त को नहीं जानता, वह सभी योगों के विशेष आवश्यक भाग से अनभिज्ञ है।

सन्तमत का यह विज्ञान अपने नियमों में अत्याधुनिक है। इसमें योग के सभी अनिवार्य नियम सम्मिलित हैं। आधुनिक पीढ़ी में वह शारीरिक क्षमता नहीं है जो प्राचीन लोगों में थी।

इन कारणों से तथा प्राचीन समय के योगियों के कई अत्यधिक रूढ़िवादी, कठिन और कष्टकर यौगिक अभ्यास आधुनिक साधक के अनुरूप नहीं हैं। परन्तु महापुरुषों का विज्ञान अथवा

सुरत-शब्द-योग जितनी सृष्टि प्राचीन है, उतना ही पुरातनः होते हुए आज भी पहले के समान ही नवीन है, क्योंकि यह सहज प्राकृतिक और ईश्वर निर्मित है। यह विज्ञान मनुष्य के साथ आया है और अन्तिम सांस तक उसके साथ ही रहेगा ।

यह पद्धति साधक को न तो अंधविश्वास में ही छोड़ती है और न ही उसे एकमात्र श्रद्धा तक सीमित रखती है। आधुनिक साधक किसी भी धर्म अथवा दर्शन को कायल हुए बिना (अच्छी तरह समझे बिना) अपनाने के लिए तैयार नहीं है।

वह मनगढ़न्त या काल्पनिक सुन्दर सिद्धान्तों में विश्वास नहीं रखता। अमरत्व जीवन का आस्वादन लेने वाला साधक अन्ध विश्वासों तथा मनगढ़न्त कल्पनाओं के दुर्बल आधार पर निर्भर नहीं रहता। परन्तु एक पद्धति ऐसी है जो अत्यन्त वैज्ञानिक तथा पूर्ण है और परीक्षण की कसौटी पर सर्वथा खरी उतरती है तथा सम्पूर्ण विश्व द्वारा मान्य है। ऐसा है यह महापुरुषों का वैज्ञानिक सिद्धान्त ।

सभी लोग मुख्यतया तीन बातों के प्रति अत्यधिक जिज्ञासा रखते हैं

  1. आत्मज्ञान 2. ईश्वर साक्षात्कार 3. मुक्ति

यदि साधक महापुरुषों के इस विज्ञान का अभ्यास करे तो यह तीनों उच्च आकांक्षायें इसी जन्म में इसी वक्त पूरी हो सकती हैं

दीक्षा के समय जो तकनीक पद्धति (तरीका) महापुरुष बताते हैं उसका पालन करने से साधक को आत्मज्ञान हो जाता है। इस में ईश्वर का साक्षात्कार और मुक्ति दोनों ही निहित हैं।

तब साधक को इसी जन्म में ही ईश्वर के घर में प्रवेश मिल जाता है। ईश्वर के इस राज्य में वह स्वतंत्रता से आ जा सकता है। आजकल इस आध्यात्मिक जागरूकता में गति बढ़ रही है। मुक्त आत्माएं सदा के लिए चौरासी के चक्कर से छूट जाती हैं और फिर वे विरोधी शक्ति ‘काल’ के बंधन में नहीं आतीं।

किसी को भी आत्मिक स्वतंत्रता, शक्ति और आनन्द केवल तर्क, तत्त्वमीमांसा और पुस्तकों का अध्ययन करने या प्रवचन सुनने मात्र से प्राप्त नहीं हो सकती।

फिर भी अधिकतर लोग सुख और शान्ति प्राप्त करने की मिथ्या आशा में इन्हीं साधनों में लगे रहते हैं। सन्त महापुरुष उनकी समस्याओं को संश्लेषण या विश्लेषण के चकराने वाले तरीकों से नहीं, बल्कि कुदरती वैज्ञानिक तरीकों से जोकि अन्तरीय दृष्टि और नाद पर आधारित हैं, सुलझा देते हैं। इस पद्धति में कोई उलझन नहीं है। यह बिल्कुल आसान और सीधा तरीका है।

परन्तु जैसे कि पहले कई बार कहा जा चुका है कि साधक को इस विज्ञान के अभ्यास के लिए मानसिक रूप से तैयार अवश्य होना चाहिए। मन से सभी वासनाओं और संस्कारों को बाहर निकाल कर साधक को इस मार्ग पर दृढ़ता से चलने के लिए तत्पर होना चाहिए।

यह मानुष जन्म ईश्वर ने कृपा करके हमें दिया है, इसका उद्देश्य एक ही है और वह है- सुरत शब्द-योग का अभ्यास।

मानुष जन्म का वास्तव में कोई निश्चित ध्येय है जो निम्न कोटि के जीवों द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। मानव की श्रेष्ठता श्रेष्ठ कर्मों में ही निहित है। निम्नकोटि के प्राणी तो अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का फल भुगतने के लिए आए हैं। इससे अधिक वह कुछ नहीं कर सकते।

परन्तु मानव पूर्व कर्मों का फल भोगने के अतिरिक्त नये कर्म करने की भी क्षमता रखता है। नये कर्म करने की यह विशेष सुविधा उसे इसीलिए प्रदान की गई है कि वह जीवन की बुराईयों से बच सके और अपने असली घर वापस जा सके।

उसके इस लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता के लिए परमात्मा ने अपने दूत ( सन्देश वाहक) सन्त अथवा महापुरुष भेजे हैं। अतः महापुरुषों का यह महान् कार्य है कि वे बिछुड़ी हुई रूहों को उनके वास्तविक स्रोत परमात्मा से मिलाते हैं। अब हम यह देखते हैं कि सन्त महापुरुष अपने इस कार्य को किस प्रकार करते हैं और कैसे अपने साधकों को ‘सुरत-शब्द-योग’ का ज्ञान देते हैं।

इस मार्ग में सबसे प्रथम और महत्त्वपूर्ण शर्त यह है कि साकार गुरु की शरण में जाकर और उनसे दीक्षा के लिए बड़ी विनम्रता पूर्वक आतुर भाव से प्रार्थना की जाए। यही एक बात है जिसे साधक को सन्त-मत के विज्ञान को जानने के लिए आवश्यक है, वह इसकी उपेक्षा या अवहेलना नहीं कर सकता।

यदि तुम सद्गुरु के शिष्य बनने के इच्छुक नहीं हो तो यह अच्छा होगा कि तुम इस मार्ग पर कदम ही न रखो । यदि तुम केवल पुस्तकों का ही अध्ययन करते हो तो तुम्हें इससे अधिक लाभ नहीं होगा, केवल समझने की शक्ति उत्पन्न हो जायेगी। इसलिए दीक्षा लेने के बाद तुम्हें गुरु की सहायता और आशीर्वाद से इस मार्ग पर चलने का अभ्यास-कार्य प्रारम्भ करना चाहिए।

अपने घर में कोई उपयुक्त स्थान चुन लीजिए जहां कोलाहल और कोई हलचल न हो। वहां कोई रोकटोक या बाधा नहीं होनी चाहिए। अपने शरीर को सीधा करके किसी आरामदायक आसन में एक निश्चित समय पर ध्यान में बैठें। अपना ध्यान सभी ओर से हटा कर भ्रू-मध्य पर केन्द्रित करें।

बड़ी सावधानी तथा प्रयत्नपूर्वक अपना ध्यान इसी केन्द्र पर स्थिर रखें और साथ में यह कल्पना भी करें कि आप वहीं पर हो। जब तक आप ध्यान या चिन्तन पर बैठे हुए हो, यह ध्यान रहे कि आपका शरीर कोई हलचल न करे। उस आसन में जिस पर बैठ कर आपने ध्यान प्रारम्भ किया था, उसमें कोई परिवर्तन न आये और आपका ध्यान केन्द्र पर निरंतर बना रहे।

यदि आप ध्यान का इच्छित फल चाहते हैं तो ध्यान के समय बाह्य संसार अथवा भूत या भविष्य का कोई विचार मन में न लायें। मन को इसी केन्द्र पर स्थित रखें। यदि किसी विचार को मन में स्थान देना ही है तो इस केन्द्र पर मालिक विराजमान हैं,

यदि तुम सद्गुरु के शिष्य बनने के इच्छुक नहीं हो तो यह अच्छा होगा कि तुम इस मार्ग पर कदम ही न रखो । यदि तुम केवल पुस्तकों का ही अध्ययन करते हो तो तुम्हें इससे अधिक लाभ नहीं होगा, केवल समझने की शक्ति उत्पन्न हो जायेगी। इसलिए दीक्षा लेने के बाद तुम्हें गुरु की सहायता और आशीर्वाद से इस मार्ग पर चलने का अभ्यास-कार्य प्रारम्भ करना चाहिए।

ध्यान ,योगाभ्यास , भजनभ्यास , meditation , नामजप , सुमिरण करने का तरीका

अपने घर में कोई उपयुक्त स्थान चुन लीजिए जहां कोलाहल और कोई हलचल न हो। वहां कोई रोकटोक या बाधा नहीं होनी चाहिए।

अपने शरीर को सीधा करके किसी आरामदायक आसन में एक निश्चित समय पर ध्यान में बैठें। अपना ध्यान सभी ओर से हटा कर भ्रू-मध्य पर केन्द्रित करें। बड़ी सावधानी तथा प्रयत्नपूर्वक अपना ध्यान इसी केन्द्र पर स्थिर रखें और साथ में यह कल्पना भी करें कि आप वहीं पर हो। जब तक आप ध्यान या चिन्तन पर बैठे हुए हो, यह ध्यान रहे कि आपका शरीर कोई हलचल न करे।

उस आसन में जिस पर बैठ कर आपने ध्यान प्रारम्भ किया था, उसमें कोई परिवर्तन न आये और आपका ध्यान केन्द्र पर निरंतर बना रहे। यदि आप ध्यान का इच्छित फल चाहते हैं तो ध्यान के समय बाह्य संसार अथवा भूत या भविष्य का कोई विचार मन में न लायें।

मन को इसी केन्द्र पर स्थित रखें। यदि किसी विचार को मन में स्थान देना ही है तो इस केन्द्र पर मालिक विराजमान हैं,

इसी विचार को लाना चाहिए। इस अभ्यास में सबसे आवश्यक बात यह है कि इस योगाभ्यास को करते समय विचार-तरंगों तथा चित्त की वृत्तियों को स्थगित कर देना चाहिए। मन और आत्मा की सभी शक्तियों को इसी केन्द्र पर केन्द्रित करना चाहिए।

जैसा कि अब इस समय हमारा ध्यान न केवल अपने शरीर में अपितु सांसारिक पदार्थों में फैला हुआ है, हमें सब में से इसको खींच कर, इस केन्द्र पर इसको केन्द्रित करना ज़रूरी है।

साधक को अपनी फैली हुई वृत्तियों को एकाग्र करने के लिए अत्यधिक परिश्रम की आवश्यकता है। परन्तु ध्यान की एकाग्रता के समान इस संसार में अन्य कुछ भी लाभदायक तथा महत्त्वपूर्ण वस्तु नहीं है।

यही सन्तों का सर्वमान्य सिद्धान्त है, चाहे वे किसी भी में या प्रदेश में हुए हों, सभी ने आत्मा की परमात्मा के युग साथ मिलन की यही युक्ति बताई है।

शिष्यों को आध्यात्मिक अभ्यास शुरु करने से पहले इसके बारे में भलीभाँति सोच-विचार कर लेना चाहिए। उसे पूर्ण सन्तोष हो जाना चाहिए कि उसने ठीक मार्ग चुना है तथा उसे अपनी आत्म-मुक्ति की अभिलाषा है।

अपने उद्देश्य के प्रति उसे सच्ची लगन होनी चाहिए। एक अन्य बात भी जिज्ञासु के लिए स्मरण रखनी आवश्यक है, वह यह कि उसे सदा यह मानना चाहिए कि सद्गुरु के वचन उसके अपने हित के लिए

हैं तथा उसे उन वचनों पर अत्यधिक श्रद्धा तथा दृढ़ता से चलना है। कभी क्षण मात्र के लिए भी यह नहीं सोचना चाहिए कि सद्गुरु के वचनों से उसके विचार अधिक श्रेष्ठ है। स्वयं को सद्गुरु की मौज में अर्पित कर देना, इस विज्ञान की वर्णमाला का प्रथम अक्षर है। सन्त-मत का यह विज्ञान विश्व व्यापी है और सभी के लिए समान रूप से उपयुक्त है। सद्गुरु सबको समान रूप से ज्ञान देते हैं। वे कभी ऐसी शिक्षा नहीं देते जो उनके शिष्यों के लिए हितकर न हो।

इसकी प्रथम सीढ़ी विवेक है अर्थात् मार्ग का चयन तथा अज्ञात यात्रा के लिए सद्गुरु को अपने मार्ग-निर्देशक के रूप में स्वीकार करने के लिए विचारपूर्वक निर्णय करना। उसके बाद अर्थात् एक बार स्वयं को सद्गुरु के समर्पित कर देने के बाद शिष्य को उनकी आज्ञा पालन करने में अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह उसके अपने लाभ तथा हित के लिए ही है (इसमें उसका अपना ही लाभ तथा हित है)।

उसमें वैराग्य होना भी आवश्यक है। उसे संसार तथा इन्द्रिय विषयों से मानसिक रूप से विरक्त होना चाहिए।

मन यदि सांसारिक इच्छाओं तथा आसक्ति से भरा हुआ है तो आत्मिक उन्नति की ओर ऊँची उड़ान नहीं भर सकता। यह पहले भी स्पष्ट रूप से कहा जा चुका है कि इस मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए शिष्य को सभी सूक्ष्म वासनाओं से अपने मन को साफ करना होगा।

ऊपर कही गई बातों को भलीभाँति समझ लेने के बाद अभ्यास के लिए निश्चित निर्धारित समय तक आरामदायक आसन में बैठकर ‘अजपा जाप’ प्रारम्भ करें। इससे मन को पूर्णतया अचल रखने में सहायता मिलेगी। यदि मन इधर उधर भटकता है जैसे कि होता ही है तो ‘अजपा जाप’ से वापस आ जाएगा। गुरुवाणी में कहा गया है—

॥ शब्द ॥

मनु लोचे बुरीआईआ गुर सबदी इहु मनु होड़िये ॥

अर्थात् मन इन्द्रिय रसों (सुखों) के लिए बाहर भटकता है। इसे ‘नाम’ की सहायता से वापस लाना चाहिए।

जबतक मन को आनन्द मिलता है, कोई भी साधक अध्यात्म के उच्च लोक में नहीं जा सकता। इसलिए महापुरुष हमें उपदेश देते हैं कि अपने शरीर के नौ द्वार बन्द रखो, जो बाह्य संसार की ओर खुलते हैं।

जब सारी चेतना बाहर से हटा ली जाती है और मन व आत्मा की सारी शक्तियां अन्दर के केन्द्र पर केन्द्रित कर ली जाती हैं तो उस के हाथ और पांव निस्तब्ध और चेतनाशून्य हो जाते हैं। तब वह आन्तरिक उच्च यात्रा करने के योग्य हो । जाता है।

जब बाह्य जगत् के साथ सारे नाते टूट जाते हैं और कोई भी चलायमान विचार उसे बाँध नहीं पाते हैं, तब सायक को इच्छित फल अवश्य मिलता है। प्रारम्भ में उसे चमकते हुए सितारे तथा प्रकाश की किरणें दिखाई देती हैं। इसके साथ उसे संगीत की मिली-जुली कुछ संगीतात्मक ध्वनियां भी सुनाई दे सकती हैं।

यह तो केवल प्रारम्भ मात्र है। और तब मन भी बार-बार बाहर की ओर भागेगा। साधक को प्रयत्नपूर्वक अपना ध्यान तीसरे तिल ( चक्षु केन्द्र ) पर लगाये रखना चाहिए। उसके इस परिश्रम का उसे फल अवश्य मिलेगा। उसे सदैव अपनी सभी मनोवृत्तियों को केन्द्र बिन्दु पर केन्द्रित करने के लिए सावधान रहना चाहिए।

जिस ध्वनि या प्रकाश का वह अनुभव करता है, उसे उसका मानसिक रूप से पीछा नहीं करना चाहिए। यदि वह पूर्ण एकाग्रता से चक्षु-केन्द्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है तो प्रकाश और ध्वनि उस केन्द्र बिन्दु पर ही आ जायेंगे।

अगर केन्द्र बिन्दु से ध्यान शिथिल हो गया अर्थात् इधर उधर भटकने लगेगा तो अन्दर सुनाई देना और दिखाई देना बन्द हो जाएगा। कुछ समय तक लगन से अभ्यास करने से जब वह बाह्य विषयों से बड़ी आसानी से अपना ध्यान हटा कर चक्षु-केन्द्र पर केन्द्रित करना सीख जायेगा तो उसकी आत्मिक शक्तियां भी बहुत बढ़ जायेंगी ।

जब पूर्ण एकाग्रता पर्याप्त समय तक हो जाये तो आत्मा शक्तिशाली हो जाती है और वह दसवें द्वार में प्रवेश कर जाती है। अब वह सूक्ष्म क्षेत्र के रंगमहल में प्रवेश करती है। प्रारम्भ में साधक केवल द्वार से ही झांकता है फिर वह धीरे-धीरे इस द्वार के अन्दर आ जाता है और शरीर बिल्कुल अचेत दशा में हो जाता है। यह संसार उसके लिए सर्वथा नया होता है।

साधक स्वयं में अत्यधिक आनन्द और शक्ति अनुभव करने लगता है। वह समस्त भौतिक जगत् को इस प्रकार देखता है जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब । उसकी मानसिक क्षमतायें प्रबल हो जाती हैं और उसे ऐसा लगने लगता है कि वह जो करना चाहे, कर सकता है। अब वह भौतिक संसार के रहस्यों को जानने लगता है तथा उनपर अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकता है। उसे इस नये जगत् की भूलभुलैया में खोना नहीं चाहिए।

उसे सद्गुरु के निर्देशन में आगे-आगे ही बढ़ना चाहिए। शुद्ध सत्लोक तथा भू-लोक (भौतिक संसार ) के बीच कई उपलोक भी हैं। कुछ लोग उन्हें ‘सूर्य लोक’ और ‘चन्द्र लोक’ तथा ‘प्रकाश लोक’ भी कहते हैं।

परन्तु सन्तों की भाषा में इसे ‘सहस्र-दल-कमल’ कहते हैं। भू-लोक की तुलना में यह लोक अधिक सुन्दर और वैभव -सम्पन्न है। यही दोनों लोकों – भू-लोक और अध्यात्म-लोक की सीमा रेखा है। इस अध्यात्म-लोक में ‘जोत- निरंजन’ का राज्य (शासन) है।

यहां पर साधक अपने गुरु के दर्शन करता है, शारीरिक रूप के नहीं अपितु उनके प्रकाशपुँज दीप्तिमान रूप के। यहां से गुरु आन्तरिक यात्रा में अपने शिष्य की पूरी-पूरी संभाल करता है।

अब साधक एक नये जीवन – दिव्य जीवन का अनुभव करता है। वह अपने अन्तःकरण से इस केन्द्र पर श्रवणीय जीवन-प्रवाह की लय को सुनता है। सुरत ज्यों ही भीतर और ऊपर की ओर जाती है, यह ध्वनि अधिक साफ, स्पष्ट और मोहक होती जाती है।

यहां से फिर ऊर्ध्व-लोक की यात्रा बड़ी तीव्र गति से होने लगती है क्योंकि इस यात्रा में सद्गुरु साथ होते हैं तथा देविक संगीत भी साथ में आगे-आगे आकर्षित करता जाता है।

प्रारम्भ में शिष्य के लिए चक्षु-केन्द्र पर ध्यान लगाना कठिन कार्य था परन्तु अब उस को इस केन्द्र से अपना ध्यान हटाना उतना ही कठिन हो जाता है। मालिक (सद्गुरु ) के दर्शन और मधुर संगीत के आकर्षण के कारण साधक सद्गुरु के सुन्दर दर्शनों से अपनी आँख (आन्तरिक दृष्टि) और मधुर संगीत से अपना कान (आन्तरिक श्रवण) नहीं हटा सकता।

इसके आगे पाँच लोक और हैं जो सब एक से एक अधिक प्रकाशमान्, देदीप्यमान् और संगीत में मधुर हैं। सहस्त्रदल कमल से साधक त्रिकुटी में प्रवेश करता है, तब क्रमशः दशमद्वार, महासुन्न, भंवर गुफा और अन्त में सचखण्ड में या सत्लोक में जाता है।

सत्लोक फिर आगे तीन लोकों में विभक्त हो जाता है जिन्हें अलख, अगम और अनामी लोक कहा जाता है। अनामी लोक परमात्मा का निवास-स्थल है। यह सभी परम सुख, शान्ति और आनन्द का अनुभव साधक को अपने जीवन में ही प्राप्त होते हैं।

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