सत्संग का प्रभाव हमारे जीवन पर कैसे पड़ता है ?

कई मनुष्य नियम से सत्संग में जाते हैं। उनका व्यवहार और व्यक्तित्व ठीक नहीं होता, तब सुसंगति का क्या महत्त्व हुआ?

सत्संग का प्रभाव

उत्तर – जिस वातावरण में मनुष्य रहता है उसका प्रभाव उसके मन पर स्थायी रूप से पड़ता है। जिस समाज में रहता है। वहाँ के व्यवहार, वाणी और उसी प्रकार के कार्यों से उसके व्यक्तित्व पर असर ज़रूर होता है। इसलिए आत्मिक उन्नति के लिए सत्संगत की आवश्यकता होती है।

सन्तों की संगति मनुष्य में प्रभु-प्राप्ति, आत्म-साक्षात्कार और पाप से मुक्ति के लिए एक आन्तरिक प्रेरणा उत्पन्न करने में सहायता करती है।

वह केवल एक सुरक्षित चारदीवारी ही नहीं बनाती, जो माया और इन्द्रियों के सभी शत्रुओं से रक्षा करती है, बल्कि वह एक ऐसा वातावरण निर्माण करती है जहाँ जिज्ञासु या कोई भी संसारी व्यक्ति परमात्मा के ऐश्वर्य और पवित्रता को समझना शुरू कर देता है।

॥ दोहा ॥

जिन जैसी संगति करी, तिन तैसो फल लीन । कदली सीप भुजंग मुख, एक बूँद गुण तीन ॥

मनुष्य जिस संगति में रहता है, उससे उसका सारा जीवन उसीके अनुसार ढल जाता है। जब स्वाँति बूँद केले के पत्ते पर गिरती है तो कपूर बन जाती है, वही बूँद सौभाग्य से अगर एक सीप के मुँह में गिरती है तो मोती में बदल जाती है। वही बूँद भुजंग (सर्प) के मुख में विष का रूप धारण कर लेती है । सन्तों की संगति से मन शुद्ध और उज्ज्वल रहता है।

॥ चौपाई ॥

मुद मंगलमय सन्त समाजू ।

जो जग जंगम तीरथ राजू ॥

“सन्तों की संगति मंगलमय है और संसार का सबसे महान् तीर्थ सत्संग है।”

सन्त महापुरुषों की संगति में मनुष्य अनन्त आनन्द, परम सुख को प्राप्त करता है। तब मनुष्य परमात्मा के साक्षात्कार की ओर ले जाने वाले आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति करता है। सन्तों की संगति से ही आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न होती है।

प्रत्येक व्यक्ति सत्संग में आने पर एकदम क्यों नहीं बदलता ?

इसका कारण उसके पूर्व जन्मों के अशुभ कर्मों का प्रभाव है। स्याही के बर्तन को धोने के लिए उसमें बार-बार पानी डालना पड़ता है।

यदि पानी पूरी तरह नहीं डालोगे तो वह बर्तन साफ नहीं होगा। इसी प्रकार जब तक मन शुद्ध और निर्मल नहीं होता, तब तक पवित्र विचार लगातार मन पर डालने चाहिये।

पिछले कर्मों के बुरे प्रभाव जितने अधिक होंगे उतना ही अधिक समय मन शुद्ध होने में लग जायेगा।

किसी को तो एक क्षण लगता है और किसी को कई जन्म लग जाते हैं। लेकिन यह तो निश्चित है कि हर क्षण कुछ हिस्सा अशुभ कर्मों का साफ हो रहा है, चाहे उसका असर उसी समय कुछ पता न चले।

एक नदी के ऊपर पुल बाँधना सभी नदियों के लिये एक जैसा नहीं होता। वह नदी की चौड़ाई के अनुसार बदलता है।

उदाहरण के लिए अमेजन नदी जो दुनिया की सबसे चौड़ी नदी है, उस पर पुल बाँधने के लिए सबसे अधिक समय लगेगा।

इसी प्रकार सन्तों की संगति का प्रभाव हमारे अच्छे और बुरे कर्मों की अधिकता पर निर्भर करता है। मनुष्य और ईश्वर के मध्य पुल तब ही बन सकता है जब मनुष्य पवित्रता के चरम बिन्दु पर पहुँच जाता है।

जैसेकि हाथ की सभी अँगुलियाँ बराबर नहीं होतीं ।

विद्यालयों में शिष्यों को शिक्षा एक ही समान दी जाती है और समान रूप से साधन भी दिये जाते हैं, लेकिन फिर भी परिणाम अलग-अलग होते हैं, ऐसा क्यों?

क्योंकि उनकी बुद्धि का स्तर और मन की ग्रहणशक्ति अलग-अलग होती है। इसी प्रकार सत्संग का प्रभाव जिज्ञासुओं पर उनकी शुद्धता और पवित्रता के स्तर के अनुसार अलग-अलग पड़ता है।

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